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युधिष्ठिर के पाँसे...काव्य

कहा दुशाशन छः मामा जी, मामा छः ले आये
देख युधिष्ठिर मौन बैठकर, मन ही मन पछताये
चलो हुआ क्या आखिर जो मै, दाँव हार ये जाँऊ
हो सकता अबकी मै जीतूँ आगे खेल बढाऊँ
यही सोचकर धर्मराज ने, आगे खेल बढाये
लेकिन भैनों के मामा ने, फिर से छः ले आये
-----
क्या जाने अंधे काकाजी, शाशन किसे थमायें
जीत गया दुर्योधन से तो, राज सहज पा जायें
उनके मन से उस पांसे का, लेकिन मन ना मिलता
पूर्व चलें जो धर्मराज तो, पश्चिम पांसा चलता
अगर छोड दें बाजी आधी, गया हाथ नाआवे
रणछोर नाम की पदवी पा, जग मे हँसी करावे
----
यही बात ने यही सोच ने, उनको फिर उकसाया
धर्मराज ने सेवक रक्षक, दासी दाँव लगाया
हार गये सब धन दौलत वो, सब सेवक सब दासी
पत्नि बन्धु अभी हैं बाकी, छाई घोर उदासी
किन्तु जुआ की लत ही ऐसी, क्या क्या ये करवाये
पत्नि बेटी बेटा भाई, सबको दाँव लगाये
----
हुआ यही युधिष्ठिर के संग, कर हद पार गये थे
वे धन भूमि पत्नि व बन्धु, सबकुछ हार गये थे
यही जुआ बनकर के कारण, महायुद्ध करवाया
महाविनाश का पृष्ठ बना, था इतिहास रचाया
----
लिख दिया विधाता ने जो कुछ, उसे तो आखिर होना था
धर्मराज के जुआ के कारण, धर्म कलंकित होना था
------
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by manoj shukla on April 22, 2013 at 2:09pm
आदर्णीय अरुण जी.....बहुत बहुत आभार
Comment by manoj shukla on April 22, 2013 at 2:07pm
आदर्णीय डा. अजय जी......प्रशंशा हेतु सादर आभार
Comment by Abhinav Arun on April 22, 2013 at 1:59pm

सशक्त सुन्दर !! आदरणीय मनोज बहुत सामयिक और सोचने को विवश करती रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारे 

Comment by Dr.Ajay Khare on April 22, 2013 at 12:17pm

manoj ji sunder rachna hetu badhai

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