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"ग़ज़ल" तू क्या तेरी हस्ती है क्या ये ध्यान में ला

ग़ज़ल कहने का प्रयास किया है

तू क्या तेरी हस्ती है क्या ये ध्यान में ला
अब उठ खड़ा हो खुद को फिर मैदान मे ला

मज़हब की बातें औ नहीं ईमान की कर
पहले ज़रा इंसानियत इंसान में ला

जब तक जिया उसको बुरा सबने कहा है
क्यूँ रोते हो अब तुम उसे शमशान में ला

नेता है उसको क्या पता क्या है ग़रीबी
उसको कभी इस कोयले की ख़ान मे ला

क्यूँ दीप जलता खुद पे ही इतरा रहा है

दम आजमा तू खुद को इस तूफान में ला

दीप

मौलिक एक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 13, 2013 at 8:43pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी सादर प्रणाम 

इस सराहना हेतु सादर आभार आपका 

आपकी इस्लाह सर आँखों 

स्नेह यूँ ही बनाये रखिये

सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 13, 2013 at 5:47pm

जब तक जिया उसको बुरा सबने कहा है 
क्यूँ रोते हो अब तुम उसे शमशान में ला-------ये शेर फिर से देख लें प्रिय संदीप तुम के साथ ला ठीक नहीं लग रहा मेरी इस्स्लाह 

जब तक जिया उसको बुरा तूने  कहा है 
क्यूँ रोता है  अब तू  उसे शमशान में ला    प्रिय संदीप जी मतले से मक्ते तक के शेर वाह वाह कहने को मजबूर करते हैं दिली दाद स्वीकारें 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 13, 2013 at 4:07pm

आदरणीय योगी जी सादर
ग़ज़ल को सराहने के लिए आपका आभारी हूँ
स्नेह यूँ ही बनाए रखिए

Comment by Yogi Saraswat on April 13, 2013 at 10:51am
नेता है उसको क्या पता क्या है ग़रीबी
उसको कभी इस कोयले की ख़ान मे ला

क्यूँ दीप जलता खुद पे ही इतरा रहा है

दम आजमा तू खुद को इस तूफान में ला

दिल से तारीफ निकलती है ऐसे शब्दों के लिए श्री संदीप जी ! एक एक अशआर खूबसूरत !
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 12, 2013 at 8:47pm

आदरणीय बृजेश जी सादर प्रणाम 

ये सब आपका स्नेह है जो लिखने के लिए प्रेरित करता है 

इसे यूँ ही बनाये रखिये 

सादर आभार आपका 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 12, 2013 at 8:45pm

आदरणीय विजय सर जी सादर प्रणाम 

आपकी सराहना पाना मेरे लिए उपहार है 

बस ये आप बड़ों का स्नहे है के विचार आते हैं और उन्हें शब्द्बद्ध कर लेता हूँ 

सादर आभार आपका 

स्नेह यूँ ही बनाये रखिये 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 12, 2013 at 8:44pm

आदरणीया डॉ प्राची जी सादर प्रणाम 

ग़ज़ल को पसंद करने हेतु आपका बहुत बहुत आभार 

स्नेह यूँ ही बनाए रखिये अनुज पर 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 12, 2013 at 8:43pm

आदरणीय बंधुवर अरुण भाई इस सराहना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आपका 

स्नेह यूँ ही बनाये रखिये सादर आभार आपका 

Comment by बृजेश नीरज on April 12, 2013 at 8:38pm

संदीप भाई बहुत खूब! दिल डूब गया आपकी रचना में। सादर बधाई स्वीकारें।

निकोर साहब की बात को दोहरा रहा हूं

//बहुत ताज़गी है आपके ख़यालों में,

इसीलिए तो अच्छे लगते हैं।//

या फिर अच्छे लगते हैं इसीलिए ताजगी भी ला देते हैं।

Comment by vijay nikore on April 12, 2013 at 8:28pm

आदरणीय संदीप जी:

 

बहुत ताज़गी है आपके ख़यालों में,

इसीलिए तो अच्छे लगते हैं। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

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