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क्या वजह क्या वजह कहर बरपा रहे
मेहरबां - मेहरबां से नजर आ रहे


ये दुपट्टा कभी यूँ सरकता न था

आज हो क्या गया यूँ ही सरका रहे


चूडियाँ यूँ तो बरसों से ख़ामोश थी

बात क्या है हुजूर आज खनका रहे


यूँ तो चेहरे पे दिखती थीं वीरानियां

औ अचानक बिना बात मुस्का रहे


दिल ये चर्चित का यूं ही बडा शोख है

देख लो आप ही इसको भडका रहे

- विशाल चर्चित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 4, 2013 at 3:01pm

गणेश भाईजी का कहा स्पष्ट तो नहीं हो पाया, किन्तु, यह अवश्य है कि चेहरा को चहरा, मोहब्बत को मुहब्बत, मेहरबान को महरबान आदि-आदि कर पढना खूब प्रचलित है.  आपने भी कोहरा का उदाहरण दिया है. इसी तर्ज़ पर कोहराम है जिसे कुहराम खूब-खूब किया जाता रहा है. आदि-आदि

उसी हिसाब से मेहरबान या मेहरबां महरबां हुआ है यहाँ.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 4, 2013 at 2:52pm

जी गुरुदेव सच कहा आपने यहाँ पर भी उच्चारण संबंधी विषय है
इसीलिए भाषा में उच्चारण भी समय रहते सीख लेना आवशयक् है
ख़ासकर ग़ज़ल के मामले मैं, क्यूंकी कभी कभी उच्चारण ही मात्राएँ गिराने के लिए इशारे करती हैं
जैसे कोहरा या कुहरा इत्यादि

सादर आभारी हूँ आपका

गणेश बागी सर से आंशिक सहमत हूँ

क्यूंकी उर्दू और हिन्दी मे साइलेंट करने की विषय मे पहली बार सुन रहा हूँ

हो सकता है ऐसा पढ़ पाने से मात्राएँ या वज्न ठीक हो जाए किंतु शब्द ही बदल जाएगा


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 4, 2013 at 2:40pm

मेहरबां - मेहरबां .....इसे ऐसे उच्चारित करें ....

मे(ह)रबां - मे(ह)रबां 

इसे बोलते वक्त ऐसे बोलते है कि ह लगभग विलुप्त (silence)  हो जाता है । 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 4, 2013 at 2:38pm

जी, संदीप भाईजी..  इस मेहरबां ने कई मेहरबानों को घनचक्कर बना डाला होगा.

इस ग़ज़ल को .. ऐ वतन ऐ वतन तुमको मेरी कसम / तेरी राहों में जां तक लुटा जाइंगे.. की तर्ज़ पर गाते चले जाइये.

आगे से चर्चित जी से पूर्ण अपेक्षा रहेगी कि साहब अपनी ग़ज़ल के साथ बह्र नही तो मिसरों का वज़्न अवश्य साझा करें, जैसा कि कई वरिष्ठ ग़ज़लकार इस मंच पर बिना शक़ोसुब्हा करते हैं.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on April 4, 2013 at 2:29pm

हरबां - हरबां 

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 4, 2013 at 2:17pm

गुरुदेव श्री इस वज्न में तो फिट नहीं बैठ रही है ग़ज़ल.

मेहरबां - मेहरबां ?


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 4, 2013 at 12:18pm

गणेश भाई.. .  २१२ २१२ २१२ २१२


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 4, 2013 at 12:15pm

वजन क्या लिया है विशाल भाई ? 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 4, 2013 at 9:43am

बहुत खूब भाई श्री विशाल चर्चित जी उम्दा गजल के लिए बधाई -

दिल ये चर्चित का यूं ही बडा शोख है
देख लो आप ही इसको भडका रहे - 

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on April 4, 2013 at 12:58am

आपका स्नेह एवं मार्गदर्शन बहुमूल्य है मेरे लिये सौरभ सर......!!!!

कृपया ध्यान दे...

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