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‘‘मैं बाहर थी”

जब तुम बुझा रहे थे अपनी आग,

मै जल रही थी.

मैं जल रही थी  पेट की भूख से,

मैं जल रही थी माँ की बीमारी के भय से,

मैं जल रही थी बच्चों की स्कूल फीस की चिंता से .

जब तुम बुझा रहे थे अपनी आग,

मै जल रही थी.

*******

मैं बाहर  थी

जब तुम मेरे अंदर प्रवेश कर रहे थे

मैं बाहर  थी

हलवाई की दुकान पर.

पेट की जलन मिटाने के  लिए

रोटियां खरीदती हुई.

मैं बाहर  थी ,

दवा की दुकान पर

अपनी अम्मा के लिए

जिंदगी खरीदती हुई .

मैं बाहर थी

बच्चों के स्कूल में

फीस जमा करती हुई .

मैं बाहर थी

जब तुम मेरे अंदर प्रवेश कर रहे थे

अभिसार की उत्तेजना से मुक्त.

अपनी नग्नता से बेखबर

मैं बाहर थी !!!!

................. नीरज कुमार ‘नीर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 23, 2013 at 9:36am

नीरज कुमार जी, सुन्दर अभ्व्यक्ति है, थोडा सा परिवर्तन कर पेट की भूक मिटाने हलवाई की दूकान पर जाने की बात रचना के 

मध्य में लिखने के बजाय फीस जमा करा चुकने के बाद लिखी जाती तो उपयुक्त रहता ताकि सारी आवश्यक जिम्मेदारियों के 

बाद ही क्षुधा शांत करने की सोच हो | बहहाल एक अच्छी रचना के लिए बधाई |

Comment by coontee mukerji on March 23, 2013 at 12:58am

neeraj ji itni teekhee aur yatharth kavita..... samaj ke muha par kitna bharee thappar hai.araamdaayak jindagee ham jeete hai aur baree baree batein karte hai aur dusree taraf samaj ka dusra pahloo , bhookmaree aur bebasee.bahut theeka viang hai neeraj ji....aur kia kahoo........

Comment by vijay nikore on March 22, 2013 at 6:06pm

नीरज जी,

 

बहुत ही मार्मिक भाव हैं।

ऐसी अभिव्यक्ति आसान नहीं है।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Pankaj Kumar Sah on March 22, 2013 at 5:04pm

सुंदर अभिव्यक्ति ....

Comment by Dr. Swaran J. Omcawr on March 22, 2013 at 2:30pm

बढ़िया , कभी कभार ऐसी रचना पढने को मिलती है 

बधाई सवीकार करें 
Comment by ram shiromani pathak on March 22, 2013 at 2:28pm

..आदरणीय नीरज कुमार नीर जी मर्मस्पर्शी रचना...

Comment by राजेश 'मृदु' on March 22, 2013 at 1:58pm

रचना का भाव पक्ष अच्‍छा लगा किंतु सारी चिंता एक पक्ष ही लेकर चला और दूसरा इससे बिल्‍कुल अलग-थलग रहा, इससे एकांगी भाव का आभास होता है । कई-कई विरोधाभास भी मेरे हिसाब से यहां हैं, यथा हलवाई की दुकान में रोटी खरीदना फिर वहीं पेट की भूख से जलना  फिर इन्‍हीं चिंताओं के समाधान हेतु दवा की दुकान, स्‍कूल की फीस भरना.....इत्‍यादि । एकबारगी ऐसा लगता है कि सताया गया पक्ष लाचार है फिर वही समाधान करता भी दिखता है जो लाचारी को खारिज करता है, सादर

Comment by Amod Kumar Srivastava on March 22, 2013 at 10:54am

मैं बाहर  थी , दवा की दुकान पर, अपनी अम्मा के लिए, जिंदगी खरीदती हुई ......आदरणीय नीरज कुमार नीर जी मर्मस्पर्शी रचना...

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 22, 2013 at 10:32am

आदरणीय नीरज कुमार नीर जी, आप की कविता "मैं बाहर थी" जिंदगी का सार ही है, नारी व्यथा!  जिसे आपने बखूबी प्रस्तुत किया।  आपको बहुज ढ़ेर सारी शुभ कामनाएं ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 22, 2013 at 9:39am

मर्मस्पर्शी रचना नीरज कुमार जी

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