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क्यों मिल गयी संतुष्टि

उन्मुक्त उड़ान भरने की

जो रौंध देते हो पग में

उसे रोते , कराहते

फिर भी मूर्त बन

सहन करना मज़बूरी है

क्या कोई सह पाता है रौंदा जाना ???

वो हवा जो गिरा देती है

टहनियों से उन पत्तियों को

जो बिखर जाती हैं यहाँ वहाँ

और तुम्हारे द्वारा रौंधा जाना

स्वीकार नहीं उन्हें

तकलीफ होती है

क्या खुश होता है कोई

रौंधे जाने से ??

शायद नहीं

बस सहती हैं और

वो तल्लीनता तुम्हारी

ओह याद नहीं अब तुम्हें

भेदती है अब वो छुअन

जो कभी मदमुग्ध करती

तुम्हारी ऊब से खुद को निकालती

अब प्रतीक्षा - रत हैं वो

खुद को पहचाने जाने का

टूटकर भी

खुशहाल जीवन बिताने का

क्या जीने दोगे तुम उन्हें

उस छत के नीचे अधिकार से

उनके स्वाभिमान से

या रौंधते रहोगे हमेशा !!!

अपने अहंकार से

इस पुरुषवादी समाज में

आखिर कब मिल पायेगी

उन्हें उन्मुक्तता ???

- दीप्ति शर्मा

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by DINESH PAREEK on February 14, 2013 at 11:25am

दीप्ति  जी बहुत कसावट  भरे  शब्दों  मैं  नारी  का  विस्मित  दर्द  बयाँ किया है.

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 14, 2013 at 10:12am

प्रतीकों और बिम्बों का ऐसा तालमेल जिसकी सराहना करने को बार बार मन करता है, अच्छी रचना बन पड़ी है , बहुत बहुत बधाई आदरणीया दिप्ती जी ।

Comment by vijay nikore on February 14, 2013 at 9:38am

रचना अच्छी लगी।

हाँ, निम्न एक पंक्ति में सारी कविता की जान है।

 

क्या कोई सह पाता है रौंदा जाना ???

 

बधाई।

विजय निकोर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 14, 2013 at 9:13am

वो हवा जो गिरा देती है

टहनियों से उन पत्तियों को

जो बिखर जाती हैं यहाँ वहाँ

और तुम्हारे द्वारा रौंधा जाना

स्वीकार नहीं उन्हें

तकलीफ होती है

क्या खुश होता है कोई

रौंधे जाने से ??---एक खूबसूरत बिंब से भाव परिलक्षित हुए बहुत अच्छी रचना हेतु हार्दिक आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 14, 2013 at 5:38am

दीप्ति शर्माजी, अरसे बाद आपकी कोई रचना देख पा रहा हूँ. घर की चौहद्दी और चौखट के पीछे अपनी भावनाओं को नित आहत होता देखती नारियों की मनोदशा का वर्णन करती कविता. इसको आप कुछ और बेहतर बिम्ब के साथ कसाव दे सकती थीं.

प्रयासरत रहें.. .

शुभेच्छाएँ.. .

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