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रिवाजो रस्म क्या सब कुछ बदल दिया तूने

जुरत-आमोज मेरे दिल ये क्या किया तूने
खगूर-ए-हम्द से भी कर लिया गिला तूने

फ़िक्रे-फ़र्दा न कोई गम कभी रहा हमको
कजा से संग दिल मेरे बचा लिया तूने

सुखन में आ गए हो ऐब ढूँढने लेकिन
हमनवा ये बता कितना जहर पिया तूने

अजल से चल रहा है क्या कभी ये सोचा है
रिवाजो रस्म क्या सब कुछ बदल दिया तूने

खुदा से मांग लो अब गैर के लिए भी कुछ
जिया अपने लिए तो "दीप" क्या जिया तूने ??

संदीप पटेल "दीप"

जुरत-आमोज - साहस सिखाने वाला
खगूर-ए-हम्द - प्रशंसा करने के आदी
फ़िक्रे-फ़र्दा - कल की चिन्ता

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on January 30, 2013 at 1:03pm

बड़ी टेढ़ी जुबान है संदीप जी, अपने तो सिर के ऊपर से ही निकल जाती यदि आपने शब्‍दार्थ नहीं दिया होता, आपका अभिवादन करता हूं इस पेशकश पर, सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 30, 2013 at 11:59am
अजल से चल रहा है क्या कभी ये सोचा है 
रिवाजो रस्म क्या सब कुछ बदल दिया तूने ------ सुन्दर चेताते हुआ सन्देश 
खुदा से मांग लो अब गैर के लिए भी कुछ 
जिया अपने लिए तो "दीप" क्या जिया तूने ? ----- बेहद उम्दा 
हार्दिक बधाई श्री संदीप कुमार पटेल जी 
Comment by अरुन 'अनन्त' on January 30, 2013 at 11:07am

मित्रवर संदीप भाई बधाई बाकी सब आदरणीय गुरुदेव श्री ने ही कह दिया है. सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 30, 2013 at 9:57am

मतले और पहले शेर पर मैं अब क्या कहूँ. ग़ज़ल के क्षेत्र में हो रहे इंकलाब के बरअक्स मैं इस तरह के किसी विन्यास को ख़ारिज़ करता हूँ. ख़ैर, पसंद अपनी-अपनी ख़याल अपना-अपना.

लेकिन जो शेर हुए हैं, वे अवश्य ही कहते हुए हैं शेर हैं.

सुखन में आ गए हो ऐब ढूँढने लेकिन
हमनवा ये बता कितना जहर पिया तूने 

यह बहुत ही मार्के का शेर है, संदीप भाई. लेकिन इसका सानी बह्र वज़्न से दोहरा नहीं हुआ जा रहा है ? तभी तो मुझे बह्र के बाहर दिख रहा है.

खुदा से मांग लो अब गैर के लिए भी कुछ
जिया अपने लिए तो "दीप" क्या जिया तूने ??

बहुत सही कहा है. निहित भाव खुल कर ही नहीं निखर कर बाहर आये है.

बहुत-बहुत बधाइयाँ.

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