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दुर्मिल सवैया
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कवि-कॊबिद हार गयॆ सबहीं, नहिं भाँष सकॆ महिमा हर की ॥
प्रभु आशिष दॆहु बहै कविता, सरिता सम कंठ चराचर की ॥
नित नैन खुलॆ दिन-रैन मिलॆ,समुहैं छवि शैल-सुता वर की ॥
कवि राज गुहार करॆं तु्म सॆ, त्रिपुरारि सुनॊ विनती नर की ॥
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दुर्मिल सवैया
===============
हरि नाम रटा कर री रसना,हरि नाम बिना जग ऊसर है !!
सब ज्ञान - बखान परॆ धर दॆ,बिन नॆह हरी मन मूसर है !!
जिय चाह रहा दुविधा-सुविधा,मति-मूरख औ मद भूसर है !!
लिपटाय रहा जिय-जाल फँसा, नहिं मारग कौनउ दूसर है !!
==========================================
दुर्मिल सवैया
===============
बृजराज जबै मिलिहैं सखि री,धरि बाँधबु आजु इहै रसरी !!
बहु नाच नचाउब ऒहि घरी,हम दॆखबु ठाढ़ि लगै कस री !!
सबु ग्वाल लहैं चतुरापन री, तुम छीन लिहौ उनकै बँसुरी !!
बहु बाजि रही यमुना-तट पै,जिय जारि रही बहुतै ससुरी !!
==========================================

( मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by ram shiromani pathak on March 9, 2013 at 8:14pm

बहुत सुन्दर .......आपकी रचना के लिए कुछ कहना मेरे लिए वैसा है जैसे 'सूरज को दीया दिखाना '.........

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2013 at 3:46pm

Saurabh Pandey  जी,,आदरणीय आपकॆ स्नेह को शत शत नमन,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2013 at 3:46pm

लतीफ़ ख़ान जी,,आदरणीय आपकॆ स्नेह को शत शत नमन,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2013 at 3:45pm

 Rajesh Kumar Jha जी,,आदरणीय आपकॆ स्नेह को शत शत नमन,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2013 at 3:45pm
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2013 at 3:44pm

upasba siag जी,,आदरणीया आपकॆ स्नेह को शत शत नमन,,,,,,,,,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 18, 2013 at 9:17am

भाई राज साहब, मुग्ध-मुग्ध-मुग्ध !

आपकी इस सवैया (दुर्मिल) ने इतना मोह लिया कि हम देर तक छंद को गाते-गुनगुनाते रहे. दूसरा तथा तीसरा छंद तो, भाई, कमाल-कमाल-कमाल ! आत्म-विस्मृति के उन सघन पलों में हम आपको तत्पल बधाई देना भी भूल गये. आपका यह पद्य-प्रयास सतत रहे और आपका यह अन्यतम सहयोग इस मंच पर बना रहे, बस यही कामना है.

शुभ-शुभ .. .

Comment by लतीफ़ ख़ान on January 17, 2013 at 9:06pm

मान्यवर , राज बुन्देली जी ,, सुन्दर,,सटीक,,सार्थक सवैयों के लिए हार्दिक बधाई ,,शब्द संयोजन व दृश्य चित्रण ने मन मोह् लिया |

Comment by Shanno Aggarwal on January 17, 2013 at 8:16pm

राज बुन्देली जी, आपकी सवैया के बारे में उपास्बा जी से पूरी तरह सहमत हूँ...आपकी रचनायें तो लाजबाब होती हैं.

Comment by upasna siag on January 17, 2013 at 4:51pm

बहुत सुन्दर .......आपकी रचना के लिए कुछ कहना मेरे लिए वैसा है जैसे 'सूरज को दीया दिखाना '.........

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