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फूल ताउम्र तो बहारों में नहीं रहते


फूल ताउम्र तो बहारों में नहीं रहते
हम भी अब अपने यारों में नहीं रहते

मुहब्बत है गर तो आज ही कह दो मुझसे
ये फैसले यूं उधारों में नहीं रहते

अब जानी है हमने दुनिया की हकीकत
अब हम आपके खुमारों में नहीं रहते

दिल तोड़ दो बेफिक्र कोई कुछ न कहेगा
ये छोटे से किस्से अखबारों में नहीं रहते

मेरा रकीब भी आज मेरी खिलाफत में है
लोग हमेशा तो किरदारों में नहीं रहते

बस वजूद की ही जंग है महफिलों में बाकी
वो तूफ़ान भी अब आशारों में नही रहते


-पुष्यमित्र उपाध्याय

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Comment by Anwesha Anjushree on December 16, 2012 at 12:16pm

प्यारा सा, चुलबुला सा, किसी का करता इन्तजार सा, लिखते रहे।

Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on December 13, 2012 at 9:00am

दमदार गज़ल भाई... बधाई स्वीकारें !

मुहब्बत है गर तो आज ही कह दो मुझसे
ये फैसले यूं उधारों में नहीं रहते !

इस शेर के लिए पुनः बधाई !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 12, 2012 at 7:09pm

भावाभिव्क्ति अच्छी लगी, भाई पुष्यमित्र जी. ग़ज़ल की ज़मीन से मिलती-जुलती रचना-प्रक्रिया को आप धीरे-धीरे संयत करते जायेंगे, ऐसी आशा है.

Comment by Shyam Narain Verma on December 12, 2012 at 5:40pm

BAHOT KHOOB JEE

 

Comment by राजेश 'मृदु' on December 12, 2012 at 5:37pm

हुजूर आपके अस'आर तो तूफान उठा ही रहे हैं, बहुत बधाई

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 12, 2012 at 3:48pm

सुन्दर रचना बधाई

Comment by seema agrawal on December 12, 2012 at 3:21pm

अब जानी है हमने दुनिया की हकीकत
अब हम आपके खुमारों में नहीं रहते......बहुत सुन्दर 

Comment by Pushyamitra Upadhyay on December 12, 2012 at 2:12pm

अरुण जी, वीनस जी, अजय सर, जवाहर सर, सतीश सर, महिमा जी,नादिर सर....आप सभी का हार्दिक आभारी हूँ...मेरा उत्साह बढाने के लिए....मेरे सीखने का दौर आप सभी के आशीष से जारी रहेगा यूं ही...प्रणाम प्रेषित करता हूँ स्वीकार कीजिये|

Comment by Dr.Ajay Khare on December 12, 2012 at 1:59pm

upadhya ji bahut khoob likha he badai

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 12, 2012 at 11:10am

भाई पुष्यमित्र उपाध्याय जी बेहतरीन लाजवाब उम्दा ग़ज़ल है मुझको भा गई ढेरों दाद कुबूल फरमाएं

कृपया ध्यान दे...

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