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ग़ज़ल : आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

बहर : २१२२ ११२२ ११२२ २२ 

रह गया ठूँठ, कहाँ अब वो शजर बाकी है

अब तो शोलों को ही होनी ये खबर बाकी है

है चुभन तेज बड़ी, रो नहीं सकता फिर भी

मेरी आँखों में कहीं रेत का घर बाकी है

रात कुछ ओस क्या मरुथल में गिरी, अब दिन भर

आँधियाँ आग की कहती हैं कसर बाकी है

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया

पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है

तू कहीं खुद भी न मर जाए सनम चाट इसे

आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

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Comment by Raj Tomar on November 28, 2012 at 8:36pm

सिंह साब, बहुत प्यारी ग़ज़ल है..और इस ये शेर तो गज़ब है.
"

तेरी आँखों के समंदर में ही दम टूट गया

पार करना अभी जुल्फों का भँवर बाकी है".. :)

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 26, 2012 at 11:12am

Chandresh Kumar Chhatlani जी, शुक्रिया जनाब

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 25, 2012 at 11:40pm

बहुत खूब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी |

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 17, 2012 at 4:32pm

PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA जी, शुक्रिया जनाब

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 17, 2012 at 3:48pm

रह गया ठूँठ, कहाँ अब वो शजर बाकी है

अब तो शोलों को ही होनी ये खबर बाकी है

aadarniy singh saahab ji, saadar 

बहुत खूब कहा. 

बधाई. 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 17, 2012 at 3:11pm

rajesh kumari जी, हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

आखिरी शे’र के लिए आपकी सलाह काबिल-ए-गौर है। इसे यूँ भी कर सकते हैं।

तू कहीं खुद भी न मर जाए मेरे सँग ‘सज्जन’

आ मेरे पास तेरे लब पे जहर बाकी है

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 17, 2012 at 2:58pm

Ashok Kumar Raktale साहब, शुक्रिया जनाब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 17, 2012 at 2:56pm

डॉ. सूर्या बाली "सूरज" साहब, बहुत बहुत शुक्रिया जनाब


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 17, 2012 at 9:24am

रह गया ठूँठ, कहाँ अब वो शजर बाकी है

अब तो शोलों को ही होनी ये खबर बाकी है

है चुभन तेज बड़ी, रो नहीं सकता फिर भी

मेरी आँखों में कहीं रेत का घर बाकी है-----इन दो शेरोकी जितनी तारीफ की जाए कम है बहुत शानदार ग़ज़ल है बस अंतिम शेर मुझे कुछ उलझा हुआ सा लग रहा है हो सकता है मैं ही नहीं समझ पा  रही हूँ बहुत बहुत बधाई धर्मेन्द्र जी इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए अंतिम शेर में मक्ता इस्तेमाल  कर के देखिये 

Comment by Ashok Kumar Raktale on November 15, 2012 at 8:00am

आदरणीय धर्मेद्र जी 

                    सादर, हर शेर दाद के काबिल बहुत उम्दा. बधाई स्वीकारें.

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