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ग़ज़ल - कुछ तेरे होने तलक थी, कुछ तुम्हारे बाद है

कुछ मुझी में प्यार मेरा, इस कदर आबाद है,
कैद में दुनिया है मेरी, दिल मेरा आज़ाद है।

पाँव थमते ही नहीं, अब मंजिलों पर भी मेरे,
ये मेरी आवारगी, शायद मेरी हमजाद है।


कुछ दिनों से चाय की प्याली नहीं खनकी यहाँ,
बिन तेरे बिखरी रसोई, क्या कहाँ, कब याद है।

है जवानी भूलती इस बात को ना जाने क्यूँ,
इक बुढ़ापे ने ही इस घर की रखी बुनियाद है।

दिल को मेरे है शिकायत जाने कितनी, हमनवां,
कुछ तेरे होने तलक थी, कुछ तुम्हारे बाद है।

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Comment

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Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on November 12, 2012 at 9:02am

बहुत सुन्दर.......बधाई !

Comment by वीनस केसरी on November 11, 2012 at 3:02pm
तगज्जुल, तखय्युल, तवज्ज़ुन, और तगय्युल  का बेहतरीन नमूना पेश किया

मुबारकबाद क़ुबूल करें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 11, 2012 at 2:30pm
दिल को मेरे है शिकायत जाने कितनी, हमनवां,
कुछ तेरे होने तलक थी, कुछ तुम्हारे बाद है।----बहुत जबरदस्त शेर बहुत बढ़िया ग़ज़ल लिखी है अरविन्द कुमार जी 

Comment by लतीफ़ ख़ान on November 9, 2012 at 8:42pm

जनाब अरविन्द कुमार जी,,,, उम्दा ग़ज़ल के लिए दिली मुबारक बाद,,,, ये शेर तो हासिले ग़ज़ल है,,,,पाँव थमते ही नहीं अब मंजिलों पर मेरे ,, ये मेरी आवारगी शायद मेरी हमजाद है ,,,,,, ऐ है,,, वाह वा ,, क्या बात है ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 9, 2012 at 6:30pm

भाई अरविन्द जी ने बेहतर ग़ज़ल कहने का प्रयास किया है.  

कुछ दिनों से चाय की प्याली नहीं खनकी यहाँ,
बिन तेरे बिखरी रसोई, क्या कहाँ, कब याद है।

यह अच्छा शेर लगा. प्रयास और बेहतर होता रहे. शुभकामनाएँ.

Comment by Arvind Kumar on November 9, 2012 at 1:46pm

धन्यवाद प्रदीप जी

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 9, 2012 at 1:23pm

दिल को मेरे है शिकायत जाने कितनी, हमनवां,
कुछ तेरे होने तलक थी, कुछ तुम्हारे बाद है।

अरविन्द जी सादर 

खूब सूरत. बधाई. 

कृपया ध्यान दे...

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