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किसी भूली कहानी का, कोई किरदार दिखता है,
मेरा क़स्बा मुझे , अब सिर्फ इक बाज़ार दिखता है।

कि जैसे सर के बदले, आईनें हों सबके कन्धों पर,
मुझे हर शख्स मुझसा ही, यहाँ लाचार दिखता है।

यही इक मर्ज़ है उसका ,दवा भी बस यही उसकी,
शहर, चाहत में पैसे की, बहुत बीमार दिखता है।

बचेगी किस तरह मुझमें, किसी मंजिल की अब हसरत,
समंदर के सफ़र में, बस मुझे मंझधार दिखता है।

न कोई रब्त है, ना गम, न कुछ बाकी तमन्नाएँ,
ये शायर शय से सारी, इन दिनों बेज़ार दिखता है।

----- अरविन्द कुमार

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by वीनस केसरी on July 11, 2013 at 5:09pm

भाई जी जिसे आप तलफ्फुज के हिसाब से मामला जम सा गया बताते हैं अरूज़ के हवाले से देखा जाए तो उसी कारण से आपका शेर बहर से ख़ारिज है
कहन के हवाले से भी ग़ज़ल को और बेहतर करने की खूब गुन्जईशें हैं

Comment by Arvind Kumar on July 11, 2013 at 2:27am

मित्रों, आपने मेरी रचना को सराहा ये मेरा सौभाग्य है. 

वीनस केसरी जी, न और ना की समस्या मुझे भी लगी परन्तु, तलफ्फुज के हिसाब से मामला जम सा गया . फिर भी कोई अरूज़ का दोष हो तो अवश्य बताएं . अभी ग़ज़ल की कक्षा का शिक्षार्थी हूँ , आप लोगों की रहनुमाई मिली तो ग़ज़ल मुकम्मल हो पाएगी।

Comment by वीनस केसरी on July 11, 2013 at 1:52am

अरविन्द जी बेहद शानदार ग़ज़ल ...
तगज्जुल तो जैसे हर शेर में छलका पड़ा है
मजा आ गया
एक एक शेर पर ढेरो दाद देता हूँ

किसी भूली कहानी का, कोई किरदार दिखता है,
मेरा क़स्बा मुझे , अब सिर्फ इक बाज़ार दिखता है।........ बेहद कामयाब मतला

कि जैसे सर के बदले, आईनें हों सबके कन्धों पर,
मुझे हर शख्स मुझसा ही, यहाँ लाचार दिखता है।..... सानी ने तो कमाल ही कर दिया

यही इक मर्ज़ है उसका ,दवा भी बस यही उसकी,
शहर, चाहत में पैसे की, बहुत बीमार दिखता है।...... बहुत खूब

बचेगी किस तरह मुझमें, किसी मंजिल की अब हसरत,
समंदर के सफ़र में, बस मुझे मंझधार दिखता है।.........बेहतरीन

न कोई रब्त है, ना गम, न कुछ बाकी तमन्नाएँ,
ये शायर शय से सारी, इन दिनों बेज़ार दिखता है।........... बहुत खूब ...

न को एक साथ १ और २ में बाँधना आपकी नज़र में सही है ?

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 10, 2013 at 5:21pm

बहुत खूब बेहद सुन्दर मतला हुआ है भाई जी खासकर दो शे'र तनिक अधिक पसंद आये. बधाई स्वीकारें.

किसी भूली कहानी का, कोई किरदार दिखता है,
मेरा क़स्बा मुझे , अब सिर्फ इक बाज़ार दिखता है।

यही इक मर्ज़ है उसका ,दवा भी बस यही उसकी,
शहर, चाहत में पैसे की, बहुत बीमार दिखता है।

Comment by ram shiromani pathak on July 10, 2013 at 2:25pm

बहुत सुन्दर रचना भाई साहब //हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2013 at 9:14pm

यही इक मर्ज़ है उसका ,दवा भी बस यही उसकी,
शहर, चाहत में पैसे की, बहुत बीमार दिखता है।
बहुत खूब 

Comment by Arvind Kumar on July 9, 2013 at 7:08pm

शुक्रिया aman kumar जी।

Comment by राजेश 'मृदु' on July 9, 2013 at 6:25pm

बहुत ही बढि़या परंतु...परंतु कि

जैसे सर के बदले, आईनें हों सबके कन्धों पर,
मुझे हर शख्स मुझसा ही, यहाँ लाचार दिखता है।

इनका अर्थ नहीं निकाल पा रहा हूं, थोड़ा मार्गदर्शन करें

Comment by aman kumar on July 9, 2013 at 2:11pm

बचेगी किस तरह मुझमें, किसी मंजिल की अब हसरत,
समंदर के सफ़र में, बस मुझे मंझधार दिखता है।

आज आपको पहेली बार पड़ने का मोका मिला अच्छा लगा !

Comment by Arvind Kumar on July 8, 2013 at 10:33pm

शुक्रिया Shijju S. जी।

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