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सागर में गिर कर हर सरिता// गीत

सागर में गिर कर हर सरिता बस सागर ही हो जाती है 
लहरें बन व्याकुल हो हो फिर तटबंधों से टकराती है 

अस्तित्व स्वयं का तज बोलो 
किसने अब तक पाया है सुख 

गिरवी स्वप्नों की रजनी का 
चमकीला हो कैसे आमुख 

खोती प्रभास दीपक की लौ, जब सविता में घुल जाती है 
लहरें बन ..........

हो विलय ताम्र कंचन के संग 
खो जाता कंचन हो जाता 

कर सुद्रढ़ सुकोमल स्वर्ण गात 
निजता पर प्रमुख बना जाता

तज स्वत्व हेम हित ताम्र ज्योति बन हेम स्वयं मुसकाती है 
लहरें बन ..........

खो कर भी निज सत्ता खुद का 
अभिज्ञान सतत रखना संचित 

माधुर्यहीन,हो क्यों नदीश में 
सलिला सम रहना किंचित 

तांबा सोने में मुस्काता ,तरणी क्षारित कहलाती हैं 
लहरें बन व्याकुल ............

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 31, 2012 at 12:26pm

बहुत सुन्दर मधुरम गीत पढ़कर मन आनंदित हो गया आदरणीया सीमा अग्रवाल जी, सागर में सरिता, मधुर मिलन में (पति- पत्नी) जब एक दूजे में समा जाते, दीपक की लौ दीया में बाति, कंचन धातु में ताम्र जैसे विलय पश्चात अपना अस्तित्व खो (समाहित) कर देते है, कहना चाहिए नौछावर कर देते है,ऐसे और भी उदहारण है जैसे गुरु/इश्वर भक्ति में लीन शिष्य | फिर भी इनका अपना महत्त्व सदा बना रहता है, इनका अपना आदर्श भी सबके सम्मुख रहता है | इसलिए गीत की अंतिम पंक्तिया बहुत ही प्रभाव पूर्ण है :-

खो कर भी निज सत्ता खुद का 
अभिज्ञान सतत रखना संचित 
माधुर्यहीन,हो क्यों नदीश में 
सलिला सम रहना किंचित 
 
हार्दिक बधाई स्वीकारे | 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 31, 2012 at 12:02pm

बहुत सुन्दर गीत लिखा है सीमा जी स्वेच्छा से किया सम्पूर्ण विलय आंतरिक आलोकिक   सुख प्रदान करता है ताम्र स्वर्ण सुख पाता है तो सरिता भी विशालता प्राप्त करती है जहां अहम् हो वहां सम्पूर्ण समर्पण होता ही कहाँ है बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर गीत के लिए 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2012 at 11:36am

//पर व्यवहार में परिलक्षित भी तो होती है लहर सिर्फ प्रतीक है उस उद्ग्विनता का ...//

अच्छा. अब मैं आपकी रचना के मुखड़े को पुनः लेता हूँ -

सागर में गिर कर हर सरिता बस सागर ही हो जाती है
लहरें बन व्याकुल हो हो फिर तटबंधों से टकराती है

लहरें बन फिर व्याकुल हो कर तटबंधों से टकराती है.

कृपया देखियेगा, उपरोक्त पंक्ति के माध्यम से आपके विचार स्पष्ट हो पा रहे हैं ?


सीमाजी, जो कुछ मैंने अपनी पिछली टिप्पणी में साझा किया है, उसे संपूर्णता में देखियेगा. सं गच्छध्वं, सं वदध्वं..  की आवृतियों के बाद वैयक्तिकता, भले कितनी ही अपरिहार्य क्यों न प्रतीत होती हो, शब्द-संप्रेषण के क्रम में ऐसे उदाहरणों के आलोक में देखना, जिन्हें मणिकाञ्चन या अन्योन्याश्रय सम्मिलन के संदर्भ में लिया जाता रहा है, झटके दे गया. कि, क्या ताम्र का स्वर्ण से सम्मिलन, या, नदी का नदीश से सम्मिलन आदि आरोपित बन्धनों के समकक्ष रखा जा सकता है !? ऐसे सम्मिलन के पश्चात भी, ये सब अपनी वैयक्तिकता फिर भी जीते हैं, तो क्या दो वृतों की परिधियों पर परस्पर काट-विन्दु का निर्माण होना अनवरत दुखों का कारण नहीं होगा ? 

आदरणीया सीमाजी, उच्च-सम्मिलन की अवधारणा वस्तुतः दो वृतों की प्रच्छन्न इकाइयों और उनकी परिधियों का परस्पर अतिक्रमण के समकक्ष न हो कर संकेन्द्रित वृतों (स्पाइरल सर्किल्स) का परस्पर निर्माण के समकक्ष है. जिसके अंतर्गत किसी वृत की परिधि दूसरे वृत की परिधि पर कोई काट-विन्दु का निर्माण नहीं करती, अपितु सर्वस्वीकार्यता के अंतर्गत एक दूसरे को लगातार समेटती चली जाती है. यह व्यक्तिगत ही सही किन्तु, सम्मिलन की आदर्श अवधारणा है.

सीमाजी, आरोपित साहचर्य सम्मिलन का पर्याय न हो कर समझौते (कम्प्रोमाइज) का प्रारूप होते हैं. और, समझौते का जीवन इस देश-काल के लिये सर्वथा आरोपित अवधारणा है. इस पर फिर कभी.. . 

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 31, 2012 at 10:59am

बहुत सुन्दर गीत आदरणीया सीमा जी, कल पढ़ा था इस गीत को पर तब कुछ व्यस्तताओं के चलते टिपण्णी नहीं दे पायी 
सागर में गिर कर हर सरिता बस सागर ही हो जाती है 

लहरें बन व्याकुल हो हो फिर तटबंधों से टकराती है ....................................बहुत सुन्दर शब्द चित्र, आज पूरे रास्ते आपकी इन दो पंक्तियाँ का कई कई भावों और विचारों के साथ मन मस्तिष्क में  खेल चलता रहा और कब कॉलेज आ गया पता ही नहीं चला

 

अस्तित्व स्वयं का तज बोलो किसने अब तक पाया है सुख .......................यह सही भी है और नहीं भी, अस्तित्व को पूर्णतः विलीन कर देना ही चिदानंद का मार्ग है, पर जब तक 'मैं' जीवित है ये अस्तित्व स्वयं को विलीन होने ही नहीं देता. दूसरा दृष्टिकोण यह भी है कि यदि अस्तित्व को स्वेच्छा से विलीन होने दिया जाए तो यह आनंदकर होता है, और यदि आरोपित बाध्यता हो तो यह एक तड़प बन जाता है.

गिरवी स्वप्नों की रजनी का 
चमकीला हो कैसे आमुख ....................जिस पीड़ा को शब्द दिए गए हैं वह संप्रेषित हो ह्रदय संवेदित कर रही है 
 
खोती प्रभास दीपक की लौ, जब सविता में घुल जाती है 
लहरें बन ..........
खो कर भी निज सत्ता खुद का 
अभिज्ञान सतत रखना संचित ......................यहाँ भी भाव बहुत सुन्दर हैं पर पुनः मन में विरोधाभासी ख़याल ला रहे है , जैसे पूर्ण समर्पण  या स्व को मिटाना पर इस बोध के साथ कि मैं भी कुछ हूँ , क्या तब पूर्ण विलय संभव है? . व्यवहारिक ज़िंदगी से सापेक्ष देखें तो लगता है, कि समर्पण को कमजोरी न समझा जाए इस लिए ये कहना उचित है .
 
आपके गीतों के शब्द हमेशा एक मोहपाश में बाँध लेते हैं . इस सुन्दर गीत हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया सीमा जी 
Comment by seema agrawal on October 31, 2012 at 10:59am

आदरणीय सौरभ जी रचना के माध्यम से दो समान परिस्थितियों के भिन्न परिणामो  को बताने कि कोशिश की है जिसे अंतिम बंद के माध्यम से स्पष्ट करने कि कोशिश भी की है आपका प्रश्न शायद इन पंक्तियों के सन्दर्भ में है 

'लहरें बन व्याकुल हो हो फिर तटबंधों से टकराती है' 

//व्याकुलता हृदय-मस्तिष्क में व्याप जाया करती है//

सौरभ जी व्याकुलता भले ही ह्रदय  और मस्तिष्क में व्यापती है पर व्यवहार में परिलक्षित भी तो होती है लहर सिर्फ प्रतीक है उस उद्ग्विनता का ......

बात अपरिहार्य परिस्थितियों की  है जो किसी के भी जीवन में  यदा-कदा आतीं ही रहतीं हैं एक ऐसी स्थिति जहां आपके समक्ष जो उसमे और आपमे किसी भी गुण धर्म का अंतर विशाल हो ........ऐसे में स्वयं को स्थापित रखना एक चुनौती होती है जो इसे दृढ़ता से स्वीकारता है वो सफल होता है अन्यथा निजता खोने की व्याकुलता  ...........

 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2012 at 10:32am

सीमाजी, ऐसा ?.. .
वैयक्तिकता तथा वैयक्तिक अवधारणाओं के मध्य अंतर स्पष्ट हों तो ऐसी सोच को जीना.. ?!!..

एक समय के बाद, सीमाजी, प्रस्तुतियों में शाब्दिकता या गठन मात्र नहीं विचारों का संप्रेषण देखना समीचीन हुआ करता है. ऐसा हमेशा तो नहीं परन्तु, कई संदर्भों में. उस हिसाब से संघुलन हेतु हेय आयाम का तय होना असहज कर गया. आपसे अब इतना कुछ स्पष्ट रूप से साझा करने की सात्विकता तो है ही.

व्याकुलता हृदय-मस्तिष्क में व्याप जाया करती है. इस व्यापने के लिये ’बनना’ क्रिया उचित होगी क्या?

रचना पर विशेष नहीं कहूँगा. भाव-संप्रेषण हेतु उच्च मानदण्ड आपका सदा से यूएसपी रहा है. यह रचना भी अलग नहीं है.  हार्दिक बधाई.

सादर

Comment by राज़ नवादवी on October 31, 2012 at 9:13am

वाह वाह वाह-

सागर में गिर कर हर सरिता बस सागर ही हो जाती है 
लहरें बन व्याकुल हो हो फिर तटबंधों से टकराती है 

दरिया का तो सागर में डूब के काम हो गया, अब सागर की समस्या है कि वो लहरों पे काबू रखे और उनकी निगहबानी करे. खूबसूरत रचना पे बधाई हो आदरणीया सीमा जी! 

Comment by UMASHANKER MISHRA on October 30, 2012 at 11:22pm

 आदरणीया सीमा जी आपकी परिकल्पना आपकी सोच पर आशचर्य चकित हो जाता हूँ 

आपके द्वारा उद्धृत  शब्द आपकी साहित्य प्रवीणता को परिलक्षित करती है 

माँ सरस्वती की आपार कृपा है 

गिरवी स्वप्नों की रजनी का 
चमकीला हो कैसे आमुख 

आपको पढ़ हम धन्य हो रहे हैं 

ह्रदय से बधाई 

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