For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल"कटाने सर कफ़न बांधे खड़ा अंजाम क्या देखे"

===========ग़ज़ल===========
बहरे- हजज
वजन- १ २ २ २- १ २ २ २- १ २ २ २- १ २ २ २

सिपाही मुल्क की सरहद पे सुबहो शाम क्या देखे
कटाने सर कफ़न बांधे खड़ा अंजाम क्या देखे

गरीबी ने मिटा डाला जिसे खाने के लाले हैं
चलाने अपना घर अच्छा बुरा वो काम क्या देखा

बना माँ बाप को अपना खुदा पूजा करो यारो
है जिसका घर यहाँ मंदिर वो तीरथ धाम क्या देखे

मिटा अभिमान खुद का कर रहा काली कमाई जो
सियासी बन गया अब नाम क्या बदनाम क्या देखे

बना आतंकवादी अब खड़ा बन्दूक ताने यूँ
जो छीने जिन्दगी पल में वो अल्ला-राम क्या देखे

संदीप पटेल "दीप"

Views: 864

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 5:01pm

स्वागत है अनुज संदीप जी !

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 12, 2012 at 4:18pm

आदरणीय अम्बरीश सर जी सादर प्रणाम आपकी सलाह इक दम दुरुस्त है कहन के भाव बिना बदले इसमें सम्पूर्णता आ गयी है
इस सहयोग और स्नेह के लिए मैं आपका आभारी हूँ
स्नेह यूँ ही बनाये रखिये अनुज पर आपका तहे दिल से शुक्रिया

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 12, 2012 at 4:07pm

अनुज संदीप जी, आदरणीय योगराज जी ने एकदम दुरुस्त फरमाया है .....फिर भी आपकी ग़ज़ल बहुत अच्छी है जिसके लिए बहुत-बहुत बधाई ....

यदि आप चाहें तो अपने दोनों शेर निम्नलिखित प्रकार से  सुधार भी सकते हैं ....

यह सिर्फ एक सुझाव ही है....

//सिपाही मुल्क की सरहद पे सुबहो शाम क्या देखे
कटाने सर कफ़न बांधे खड़ा अंजाम क्या देखे//

सिपाही मुल्क की सरहद पे सुबहो शाम क्या देखे
कफ़न बांधे कटा ले सर खड़ा अंजाम क्या देखे

//गरीबी ने मिटा डाला जिसे खाने के लाले हैं
चलाने अपना घर अच्छा बुरा वो काम क्या देखा//

गरीबी ने मिटा डाला जिसे खाने के लाले हैं
चला ले अपना घर अच्छा बुरा वो काम क्या देखे…….सस्नेह

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 12, 2012 at 3:47pm

\\वैसे जिस बिंदु पर मैंने बात की उसे इल्म-ए-अरूज़ में "ऐब-ए-अख्लाल" कहा जाता है, जब किसी मिसरे में किसी शब्द की कमी रहा जाए तब यह ऐब पैदा होता है.\\

इस इक और ऐब के बारे में मेरी जानकारी बढाने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय योगराज सर जी
बहुत बहुत आभार आपका
स्नेह यूँ ही बनाये रखिये
सादर प्रणाम


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 2:43pm

आपने मेरे कहे को मान दिया, दिल से आभारी हूँ संदीप भाई. वैसे जिस बिंदु पर मैंने बात की उसे इल्म-ए-अरूज़ में "ऐब-ए-अख्लाल" कहा जाता है, जब किसी मिसरे में किसी शब्द की कमी रहा जाए तब यह ऐब पैदा होता है.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 12, 2012 at 1:33pm

जी आदरणीय योगराज सर जी
अब समझ में आया
आपकी दी इस हिदायत को भी हमेशा ध्यान रखूँगा सर जी
अब से यही कोशिश रहेगी के ऐसी कहन में शब्दों की पूर्ती हो जाये
आपका बहुत बहुत आभारी हूँ सर जी
मार्गदर्शन  सहित स्नेह और आशीष बनाये रखिये


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 1:25pm

भाई संदीप पटेल जी
जिस सन्दर्भ में आपके ये दोनों शेअर के मिसरे हैं, वहां
"कटाने सर"
"चलाने अपना घर"
का प्रयोग सही नहीं, वो सही है कि वज्न-ओ-बहर के हिसाब के कोई कमी नहीं लेकिन
"कटाने सर" की बजाये "कटाने को सर" अथवा "सर कटाने को "तथा "चलाने अपना घर" की बजाये  "चलाने को अपना घर" अथवा "अपना घर चलाने को" कहना व्याकरण और भाषा की शुद्धता की मांग है.     

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 12, 2012 at 1:01pm

आदरणीय योगराज सर जी सादर प्रणाम
सर्वप्रथम तो आपने जो मुझे आज इक ताज पहना दिया स्टार ग़ज़ल-गो का उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ लेकिन अभी ये स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ इसके लिए खेद है मैं अभी सीखने की जमीं पे हूँ जहाँ मुझे केवल और केवल सीखना है जिस दिन में इस लायक हो जाऊंगा उस दिन आपका ये ताज सहर्ष स्वीकार करूँगा और आप सब का आशीर्वाद रहा तो इक दिन अवश्य वो दिन नसीब होगा
फिर मैं आपकी दी हुई हिदायत को इस बार समझने में असमर्थ रहा हूँ और ऐसा होना शायद मेरे लिए स्वाभाविक है क्यूंकि यदि मैं इस बात को समझता तो ऐसी गलती ही क्यूँ करता ||
मैंने अपने सारे शेर पढ़ के तक्तीह करने के बाद ही मंच पर प्रेषित किये हैं क्यूंकि आदरणीय वीनस सर और गुरुवर सौरभ सर की मांग थी की ग़ज़ल को पढ़ पढ़ के देखें और यदि सही लगे तभी पोस्ट करें
अब आपने कहा के मैं कुछ छोड़ के आगे बढ़ जाता हूँ तो मैं असमंजस में हूँ की आखिर क्या छूट गया है मुझसे कहाँ गलती हो गयी है
कृप्या एक बार मेरा मार्गदर्शन कीजिये
आपका तहे दिल से शुक्रिया और सादर आभार
स्नेह और आशीष यूँ ही बनाये रखिये


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 12, 2012 at 11:23am

भाई संदीप पटेल जी, अगर मैं यह कहूँ कि आप ओबीओ के स्टार ग़ज़ल-गो हैं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. मैं आपको पहले  दिन से ही फोलो कर रहा हूँ और आप उन चाँद शायरों में से एक हैं जिनकी रचनायों को मैं बहुत ध्यान से पढता हूँ. आपके पास कहन बहुत उच्चकोटि का है, वज़न-ओ-बहर पर पकड़ भी मज़बूत हो रही है. लेकिन बहुत जगह न जाने क्यों आप अक्षर "खा" जाते हैं जो इतनी जबर्दस्त बदमजगी पैदा करता है कि पूछें मत. इस ग़ज़ल के ही दो मिसरे देखें     

//कटाने सर कफ़न बांधे खड़ा अंजाम क्या देखे
//
//चलाने अपना घर अच्छा बुरा वो काम क्या देखा //

"कटाने सर" और "चलाने अपना घर" में क्या  आपको किसी शब्द की कमी नज़र नहीं आ रही ? सुभाषता और साफ़ साफ़ कहन गजल की बेसिक खूबियों में से एक है. लेकिन यहाँ ये दोनों मिसरों में भाषा के स्तर पर चूक हुई है जो कि बेहद अटपटी लग रही है.

एक मिसरा और देखें:
//सिपाही मुल्क की सरहद पे सुबहो शाम क्या देखे //

यहाँ "मुल्क+की" में दो "क" आ जाने से "मुलक्की" बन गया है जोकि उच्चारण को बाधित कर रहा है है. "मुल्क" की बजाये "देश" क्या बेहतर नहीं होगा ?

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 11, 2012 at 11:28am

आदरणीय मकरंद जी, परम आदरणीय गुरुवर सौरभ सर जी, आदरणीया रेखा जी सादर प्रणाम
आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया और सादर आभार
ये स्नेह अनुज पर यों ही बनाये रखिये

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
8 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
8 hours ago
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
11 hours ago
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
14 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Thursday
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service