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गाँव की विधवाओं को सरकार की ओर से सहायता राशि वितरित की जा रही थी. तभी एक नौजवान विधवा अपने हिस्से की धनराशि लेने मंच की ओर बढ़ी, जिसे देख नेता जी ने सरपंच के कान में धीरे कहा,
"ये लड़की कौन है ?"
"
ये नंदू लुहार की बहू है नेता जी."
"अरे भई इसको तो बाकियों से ज्यादा पैसा मिलना चाहिए था."
"वो क्यों नेता जी ?"
"अरे
मुखिया जी, ज़रा बॉडी तो देखिए ससुरी की."  

 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 10, 2012 at 11:48am

गन्दी मानसिकता, जो आँखों से ही स्त्रीत्व का चीर हरण करते हैं इसका जबरदस्त उदाहरण है ये लघु कथा जो अन्दर से रोष युक्त कर मन को झकझोर  देती है बधाई आपको इस लघु कथा के लिए|

Comment by राजेश 'मृदु' on October 10, 2012 at 11:25am

आपकी इस कसी हुई रचना के लिए हार्दिक बधाई एवं नमन, बरबस ही मंटो की स्‍मृति कौंध गई, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 10, 2012 at 10:57am

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी, 

सादर नमन!

शक्ति पूजा की अवधारणा पर कैसा तमाचा है इस प्रकार की कुत्सित मानसिकता, जो समाज में जहां तहां व्याप्त है..

लघुकथा में समाज की यह विद्रूपता भली प्रकार से स्पष्ट हुई है.

हार्दिक बधाई इस सत्यपरक लघुकथा के लिए.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 10, 2012 at 10:45am

आदरणीय योगराज सर जी सादर प्रणाम
कुटिल मानसिकता पर करारा प्रहार करती हुई इस रचना के लिए साधुवाद सर जी
समाज ऐसे दोमुखी सफेदपोशों से भरा हुआ है
उसी वक़्त यदि मुखिया जी नेता जी के मुंह पर जोरदार तमाचा जड़ दिया होता तो उनकी आँखें खुल जाती
लेकिन मुखिया भी कहाँ दूध के धुले हैं 
उन्होंने तो इस पर जोरदार चुटकी लेते हुए अपने अधरों पर कुटिलता भरी मुस्कान सजा ली होगी

बेहद सार्थक व्यंग रुपी कथा कही है सर जी

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