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एक राष्ट्र एक टोली, एक भाव एक बोली,
हिंदी से ही हो सकेगी, आप जान जाइए |

भाषा ये सनातनी है, शीलवाली, पावनी है,
शोला है सुहावनी है, विश्व को बताइए |

पूर्वजों ने भी कहा है, हिंदी ने बड़ा सहा है,
हिंदी को बढ़ावा दे के, विद्वता दिखाइए |

भारती की कामना है, शत्रु को जो थामना है,
भाई मेरे बंधु मेरे, हिंदी को बचाइए ||

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 13, 2012 at 4:14pm
आदरणीय योगी जी, अपनी हिन्दी के लिये ये मेरी भावनाएँ हैं। हिन्दी बिना हिन्द की कल्पना अधूरी है। सराहना के लिये आपका आभारी हूँ।
Comment by Yogi Saraswat on September 13, 2012 at 11:10am

पूर्वजों ने भी कहा है, हिंदी ने बड़ा सहा है,
हिंदी को बढ़ावा दे के, विद्वता दिखाइए |

भारती की कामना है, शत्रु को जो थामना है,
भाई मेरे बंधु मेरे, हिंदी को बचाइए ||

सुन्दर शब्दों में यथार्थ को दिखाती रचना कुमार साब !

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 13, 2012 at 10:27am

आदरणीय मित्र संदीप पटेल जी......सराहना के लिए आपका आभार........आपने जो पंक्तियाँ दी हैं बिलकुल वो भी सही बैठतीं हैं.....धन्यवाद.....

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 13, 2012 at 10:12am

आदरणीय अजीतेंदु जी सादर
आपकी घनाक्षरी कथ्य और शिल्प की दृष्टि से बहुत उत्तम है
किन्तु अंत में जैसा की आदरणीय सौरभ सर ने कहा
कमजोर हो रही है
उस पर ध्यान देना परम आवश्यक है

काम धाम में भी आप हिंदी अपनाइए
 यदि ऐसा कहा जाये तो कैसा रहे

सादर

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 13, 2012 at 7:01am

आदरणीया सीमा जी........प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद......आपकी प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक है.........आभार....

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 13, 2012 at 6:56am

आदरणीय अग्रज अम्बरीश जी.........खुले दिल से की गई सराहना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद......आपका स्नेह और आपकी सीख तो सदैव मार्गदर्शन करती है...आभार..........

Comment by seema agrawal on September 12, 2012 at 11:58pm

कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से सुगढ़ घनाक्षरी के लिए बधाई कुमार गौरव जी 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 12, 2012 at 10:56pm

प्रिय कुमार गौरव जी ,  बेहतर शिल्प से सुसज्जित सुन्दर घनाक्षरी के लिए हार्दिक बधाई मित्र !

जैसा कि आदरणीय सौरभ जी ने कहा है कथ्य में बारीकी से थोड़ा सा सुधार करके इसे सोने से कुंदन बनाया जा सकता है ! सस्नेह

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 12, 2012 at 10:17pm

आदरणीय अलबेला भैया.......आपका प्यार सर-आँखों पर.......धन्यवाद......

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 12, 2012 at 10:16pm

आदरणीया राजेश जी.....सराहना हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.......आपलोगों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है.....इसी का नाम तो ओ बी ओ है.........एक बार पुनः आभार....

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