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अरे ! कहाँ गई !
अभी तो यहीं थी !
लगता है कहीं गिर ही गई
इस आपाधापी में,
हो सकता है कुचल दी गई होगी
किन्हीं कदमों के तले,
या फिर उड़ा ले गया उसे
झोंका कोई हवा का ;
चाहे चुरा ले गया होगा चोर कोई,
लेकिन चुराएगा कौन !
चीज तो काफी पुरानी थी
फटी-चिटी, धूल-धूसरित,
बहुत संभव है फेंक दिया होगा
किसी ने बेकार समझ के
और ले गया होगा कोई
आउटडेटेड आदमी अपने
स्वभाव के झोपड़े में लगाने के लिए ;
कहीं कहानी लिखनेवाले
तो उठा नहीं ले गये !
कवियों का भी काम हो सकता है,
अन्यथा कोई वृद्ध ले गया होगा
अपने जमाने की शान को
लगा के कलेजे से,
बैठ के अकेले में साथ रोने के लिये
अपनी और उसकी दुर्दशा पर ;
खैर.......जो कुछ भी हो,
अब तो मिलने से ही रही
वो खोई हुई चीज
"मिठास रिश्तों की" |

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Comment

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Comment by Yogyata Mishra on September 3, 2012 at 9:51pm

बहुत ही सराहनीय प्रयास...!!!

Comment by Rekha Joshi on September 3, 2012 at 6:21pm

गौरव जी आजकल तो रिश्तों में मिठास की जगह खटास ने ले ली है ,बढ़िया रचना ,बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 3, 2012 at 4:26pm

रिश्तों की मिठास को खोजने का ये सफ़र बहुत सुन्दर लगा, रचना में एक प्रवाह है जो अंत तक बांधे रखता है, इस हेतु हार्दिक बधाई... आदरणीय लक्ष्मण जी की बात  से तो मैं भी सहमत हूँ...

हार्दिक बधाई इस सोच व इस अभिव्यक्ति के लिए 
Comment by PHOOL SINGH on September 3, 2012 at 2:35pm

कुमार जी नमस्कार

बहुत ही सुंदर मीठास भरी रचना.की प्रस्तुति ...........

फूल सिंह

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 3, 2012 at 2:29pm

भाई कुमार गौरव अजितेंदु जी कोई कवी तो नहीं ले गया होगा चुरा के मिठास रिश्तों की | ले भी गया होगा तो उकेर के रख गया होगा, देखो, सुन्दर रचना के लिए बधाई  

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 3, 2012 at 11:43am

bahut sundar pryaas hai aapka is tarah ki rachna me

ant tak bandhe rahe mithaas ki khoj me badhaai ho aapko

कृपया ध्यान दे...

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