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जब जब हैं आतंकी आये

बिल में चूहे सा घुस जाये  

खो जाए उसकी आवाज़

क्या सखि नेता? नहिं सखि राज! 

______________________

नाम जपे नित भाईचारा.

भाई को ही समझे चारा 

ऐसे झपटे जैसे बाज़

क्या सखि नेता? नहिं सखि राज! 

______________________

प्लेटफार्म पर सदा घसीटे

मारे दौड़ा दौड़ा पीटे

इम्तहान क्या दोगे आज

क्या सखि पोलिस ? नहिं सखि राज !

_______________________

चलती जिसकी अज़ब गुंडई 

कहे, निकल ले, छोड़ मुम्बई

उठा-पटक जिसका अंदाज़

क्या सखि सत्ता? नहिं सखि राज !

_______________________

खुराफात में जिसका है मन

जिसका उत्तर भारत दुश्मन

दबंगई नित जिसका काज

क्या सखि भाई? नहिं सखि राज !

______________________

लगता है थोड़ा सा खिसका

खानदान सिरफिरा है जिसका

क्षेत्र-वाद का छेड़े साज 

क्या सखि गोरा? नहिं सखि राज ! 

______________________

वैसे तो वह बना कसाई

फिर भी है अपना ही भाई

दें सद्बुद्धि जिसे प्रभु आज

क्या सखि जालिम? नहिं सखि राज !

_______________________

--अम्बरीष श्रीवास्तव

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Comment

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Comment by Albela Khatri on August 23, 2012 at 7:45pm

आप से पूर्ण सहमत हूँ प्रभु......
नियम जानना  और उनकी अनदेखी नहीं करना  अत्यावश्यक है . छन्द का आनन्द ही उसके कसाव में है  और कसाव का हुनर अगर  न हो  तो रचना के बिखर जाने का पूरा खतरा होता है

धन्य हो अम्बर जी........लगता है साल दो साल में आप मुझे  हुशियार कर ही देंगे....हा हा हा

सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 7:44pm

स्वागत है डॉ०  प्राची जी ! इन मुकरियों के मर्म तक जाकर इनकी सराहना के करने के लिए हार्दिक आभार स्वीकारें ! सादर !

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 7:40pm

सत्य कहा आदरणीय अलबेला जी, मात्रा संबंधी सारे नियम उत्तम प्रवाह व सटीक गेयता बनाए रखने के लिए ही हैं| परन्तु इन नियमों का अध्ययन व अभ्यास अति आवश्यक है| सादर

Comment by Albela Khatri on August 23, 2012 at 7:35pm

जी अम्बरीश जी......
आपने सही कहा.........
प्रवाह बाधित नहीं होना चाहिए..........मात्रा सम्बन्धी सारे नियम प्रवाह बनाए रखने के लिए हैं......यदि वो ही अवरुद्ध हो जाये तो..........अच्छी से अच्छी रचना भी प्रभावित  नहीं करेगी......

आपने ध्यान दिया.......आपका आभार प्रभु !
महाप्रभु नहीं आये अभी तक ?
__सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 7:22pm

जय हो जय हो ......आदरणीय अलबेला जी,

आमतौर पर कह-मुकरियों में प्रति चरण १६ मात्रायें देखी गयी हैं ....परन्तु कहीं-कहीं पर यह १५ भी पायी गयी हैं जैसे कि भारतेंदु जी की निम्नलिखित कह मुकरियाँ देखिये ....

तीन बुलाये तेरह आवें,

निज निज विपदा रोइ सुनावें,

आँखौ फूटे भरा न पेट,

क्यों सखि! सज्जन? नहिं ग्रेजुएट|

सीटी देकर पास बुलावै,

रुपया ले तो निकट बिठावै, 

ले भागै मोहिं खेलहिं खेल,

क्यों सखि! सज्जन? नहिं सखि रेल|

यह भी एकदम सही है कि इनके प्रत्येक पद  में प्रवाह व गेयता कहीं भी बाधित नहीं होनी चाहिए ...

मुकरी में १७ मात्रायें अभी तक मेरी दृष्टि में नहीं आयी हैं  ..सादर

Comment by Albela Khatri on August 23, 2012 at 6:33pm

बहुत बहुत धन्यवाद  आदरणीय अम्बर जी........

आपने एक दम सही सुझाया ...परन्तु मेरे मन में ये था कि मात्र १६  ...बल्कि १६ भी ८-८ के हिसाब से होनी चाहिए  इसलिए मैं कुछ बांध सा गया था.........आपकी बात से समझ आ गया  कि  मात्र भले ही १५ या १७ हो, प्रवाह नहीं रुकना चाहिए..............

जय हो जय हो


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 23, 2012 at 5:08pm
सामयिक राजनैतिक विषय पर, आपकी संवेदनशीलता बाखूबी मुखरित हुई है...
सत्ता लोलुपता और निज स्वार्थ का मेल, मुम्बई के शासन की बागडोर का क्या जीवन्त वर्णन कहमुकरियों के माध्यम से किया है आपने, इस हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय अम्बरीश जी.
Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 4:14pm

कुमार गौरव जी ! इसे पसंद करने के लिए बहुत-बहुत आभार!

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 3:45pm

धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण जी !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 23, 2012 at 3:12pm

बहुत सुंदर कह मुकरियाँ, बधाई आदरणीय  

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