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हरिगीतिका छंद एक प्रयास.

(चार चरण, १६ + १२ =२८ मात्राएं और अंत में लघु गुरु)

 

हरि जनम हो मन आस  लेकर, भीड़ भई  अपार  है/

हरि भजन गुंजत चहुँ दिसी अरु,भजत सब नर नार हैं//

झांझ बाजै है झन झनक झन , ढोल की  ठपकार  है/

मुरली बाजत  मधुर  शंख  ही,  गुंजाय   दरबार  है//

हरि घन घनन घन आसमा पर, जोर की बरसात है/

मन मेरा पर  आँखे  मीचे, प्रभु दरस  की  आस है//

सजे  द्वार  सुन्दर  घर  सकल, नगर  कारागार  है/

सजे श्याम सुन्दर  हर  हरिहर, सजा हरि दरबार है//

 

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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on August 8, 2012 at 11:45am

आदरणीय अशोक जी इस पहले प्रयास पर बहुत-२ बधाई स्वीकार करें

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 6, 2012 at 11:36pm

संदीप जी

            सादर, आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं.मेरा प्रयास जारी है, मै आदरणीय सौरभ जी द्वारा दी गयी सलाह पर अमल कर आगे छंद को सही बनाने का प्रयास करूँगा. यदि आपने त्रुटियों के बारे में कुछ ज्ञान प्रदान किया होता तो और भी प्रसन्नता होती. आगे भी इसी तरह सहयोग कि अपेक्षा रहेगी. धन्यवाद.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 6, 2012 at 9:48am

इस प्रथम प्रयास को साधुवाद साहब
और प्रयास कीजिये संभवतः कुछ कमियाँ हैं
इससे छंद के प्राण संकट में जान पड़ते हैं
इसे गुरजन की अमोघ संजीवनी की आवश्यकता सी जान पड़ती है 

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 6, 2012 at 8:11am

आदरणीय बाली जी

                   नमस्कार, बहुत खुशी होती है जब एक नायाब गजलकार छंदों कि तारीफ़ करता है. स्नहे बनाए रखें. धन्यवाद.

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 6, 2012 at 8:10am

आदरणीय अलबेला जी, गौरव जी, आदरणीय अरुण जी सादर, आप सभी कि प्रशंसा मुझे अपनी त्रुटीयाँ सुधारने में मदत करेगी. धन्यवाद.

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on August 6, 2012 at 7:38am

अशोक भाई नमस्कार ! प्रभु जनम पर आपका यह सुंदर प्रयाश भक्ति भाव से ओत प्रोत कर दिया। सुंदर छंद पर मेरी तरफ से भी बधाई स्वीकार करें !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 5, 2012 at 11:29pm

झांझ बाजै है झन झनक झन , ढोल की ठपकार है/

हरि घन घनन घन आसमा पर, जोर की बरसात है/

आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी, इन पंक्तियों में ध्वन्यात्मकता देखते ही बन रही है. सुंदर हरिगीतिका वातावरण को भक्तिमय कर रही है.

सुंदर छंद सृजन हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 5, 2012 at 10:34pm

भक्तिमय प्रस्तुति.......मन को भाती हुई.......प्रभु चरणों में नत है मेरा भी शीश.......

Comment by Albela Khatri on August 5, 2012 at 10:32pm

waah waah kya kahne....

झांझ बाजै है झन झनक झन , ढोल की  ठपकार  है/

मुरली बाजत  मधुर  शंख  ही,  गुंजाय   दरबार  है//

हरि घन घनन घन आसमा पर, जोर की बरसात है/

मन मेरा पर  आँखे  मीचे, प्रभु दरस  की  आस है//

__bahut khub !

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 5, 2012 at 10:49am

आदरणीय सौरभ जी

                       सादर नमस्कार, मै इस साहित्यिक मंच पर जो देखता सीखता हूँ, शैली सुधार कि द्रष्टि से उसे यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.  आपका मार्ग दर्शन मुझे आगे भी मंच पर नयी विधाओं में लिखने के लिए प्रेरित करेगा.आप से सदा  ऐसे ही सहयोग कि आस रहेगी. आभार.      

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