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मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

होता हूँ जब अकेला चुपके से आता है
मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

कभी बन आँखों में आँसू
कभी बन दिल में कसक
रातों को जगाने सपनों में
मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

मैं अपने गाँव का, गाँव मेरा है
उसके सपने सारे सपने मेरा है
होता हूँ जब अकेला चुपके से आता है
मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

मैं अपने गाँव को सम्हालूँगा
मैं अपने सपनों को फिर से सजाऊंगा
टूटा हुआ तारा हूँ मैं जिस गाँव का
फिर से वहीं पे जाके जुड़ने को जाऊँगा

बसाया तो मैंने भी सपनों का सुंदर शहर
सब कुछ पाया गाँव नहीं भूल पाया मगर
जहाँ मैंने कदम पहला-पहला रखा
चलने से पहले जिस मिट्टी को चक्खा

तोतली बोली को मेरे सुना जहाँ सबने
सुनने को जाउँगा उन सबके मैं सपने

होता हूँ जब अकेला चुपके से आता है
मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

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Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on June 8, 2012 at 1:52pm

आपका हार्दिक धन्यवाद   PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA जी......

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 8, 2012 at 1:34pm

तेरा गांव मेरा गांव कैसे भूल सकता धूप छांव

जनम हुआ था मेरा वहीँ पसारे थे जमीं पे पाँव 

बधाई 

Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on June 7, 2012 at 4:40pm

धन्यवाद एवं सादर प्रणाम Ganesh Jee "Bagi"  साहेब


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 7, 2012 at 4:22pm

खुबसूरत रचना, गाँव से लगाव किसे नहीं होता, गाँव की मिटटी की बात ही कुछ और है |बधाई स्वीकार कीजिये मनु जी |

Comment by जगदानन्द झा 'मनु' on June 7, 2012 at 12:13pm

डॉ. सूर्या बाली "सूरज"  जी राजेश   कुमारी जीआशीष यादव  जी Rekha Joshi जी Albela Khatri  जी , आप सभी का हार्दिक धन्यवाद एवं सादर प्रणाम , आप सभी का इतना स्नेह पा कर मैं धन्य हो गया |  

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 7, 2012 at 9:57am

जहाँ मैंने कदम पहला-पहला रखा
चलने से पहले जिस मिट्टी को चक्खा
तोतली बोली को मेरे सुना जहाँ सबने
सुनने को जाउँगा उन सबके मैं सपने....

मनु जी ! बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ अतीत की याद ताज़ा करती हुई। इतनी सुंदर रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 7, 2012 at 9:09am

अतीत की यादें कभी भुलाए नहीं भूलती और फिर जहां पले बढे वहां की बात ही द्द्सरी है बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना मनु जी बहुत बधाई 

Comment by आशीष यादव on June 7, 2012 at 12:15am
सर अपना गाँव अपना ही होता है। ढेर सारी यादेँ जुड़ी होती हैँ। इन यादोँ को कविता मे पिरोने पर आपको बधाई
Comment by Rekha Joshi on June 6, 2012 at 10:53pm

Manu ji 

मैं अपने गाँव को सम्हालूँगा 
मैं अपने सपनों को फिर से सजाऊंगा
टूटा हुआ तारा हूँ मैं जिस गाँव का 
फिर से वहीं पे जाके जुड़ने को जाऊँगाbahut achchhi rachna ,badhai 

Comment by Albela Khatri on June 6, 2012 at 9:25pm

गाँव तो गाँव है  जगदानन्द जी, गाँव की महक  जीवन भर नहीं जाती............
बधाई इस सुन्दर लेखन के लिए 

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