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मानव न बन सका मनुज

यह कविता मेरे पापा की लिखी हुई है और मै इसे उनकी सहमती से पोस्ट कर रही हूँ |

मै ही तो एक नही हूं ऐसा,
मुझ से पहले भी लोग बड़े थे :
जिन को तो था संसार बदलना ,
अंधेरों में जो लोग खड़े थे :
उन लोगों में मेरी क्या गिनती ,
मुझ से तो वे सब बहुत बड़े थे :
खा कर भी हत्यारे की गोली ,
गांधी जी कितने मौन पड़े थे :
और अहिंसा हिंसा ने खाई ,
था नफरत ने ही प्यार मिटाया :
प्यार दिया इस जग को जिसने ही ,
क्रास पर गया था वह लटकाया :
पर मानव न बन सका मनुज अभी ,
पशुता उसकी उसके साथ रही |

Views: 638

Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 4, 2012 at 4:09pm

आदरणीय रेखा जी , सादर अभिवादन 

पाशविकता अभी हावी है न जाने क्यूँ और किस लिए 

धन्यवाद पापा जी को और आपको भी.

Comment by Yogi Saraswat on June 4, 2012 at 3:47pm

स्पष्ट सन्देश देती हुई रचना है आपके पापा की आदरणीय रेखा जी !

Comment by Yogi Saraswat on June 4, 2012 at 3:47pm

स्पष्ट सन्देश देती हुई रचना है आपके पापा की आदरणीय रेखा जी !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 4, 2012 at 12:49pm

बहुत खूबसूरत रचना है रेखा जी बहुत सुन्दर भाव अंतिम पंक्ति ही निचौड़ है रचना की बधाई आपे पिता श्री को ओर पढवाने के लिए आपको भी 

कृपया ध्यान दे...

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