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गीतों से दिल की बातें, कैसे तुम्हें सुनाऊं ..

गीतों से दिल की बातें, कैसे तुम्हें सुनाऊं  .

बेबस नयन की बोली, कैसे तुम्हें दिखाऊ.

दिल कुमुदनी सा देखो, प्रियतम मेरी तुम्हारा ,

चन्द्र चन्द्रिका से दिल की, कैसे इसे खिलाऊं .

दर्पण से दिल में जो भी ,संजोये तुमनें सपने ,

दर्पण में अक्स दिल का , कैसे तुम्हें दिखाऊ.

काज़ल ने है बचाया, नज़र से ज़माने की ,

वो ख्वाब तुम्हारे हैं, ज़माने से मैं छिपाऊं .

ऋतु बसंत पतझड़ पर, छा गयी गुलिस्ताँ में,

मैं खिल उठा सुमन सा , जग को ज़रा बताऊँ .

बदरी बन के छाए , धरती की प्यास पर तुम ,

धरा पे गरज के बरसे , तन में तुम्हें समाऊं.

रचयिता : गीतकार डा अजय .

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Comment

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Comment by Dr Ajay Kumar Sharma on March 24, 2012 at 11:39am

सभी सुधी मित्रों का आभार जिन्होंनें रचना को पढ़ा व अपनी प्रतिक्रियाएं दी . सादर नमन .

Comment by वीनस केसरी on March 23, 2012 at 1:31pm

गीतकार की वेदना रचना से स्वतः स्फुटित हो रही है
सुन्दर रचना के लिए बधाई

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on March 22, 2012 at 10:55pm

सर शशक्त भावाभियक्ति के लिए बधाई स्वीकार करें

Comment by AVINASH S BAGDE on March 22, 2012 at 7:55pm
ऋतु बसंत पतझड़ पर, छा गयी गुलिस्ताँ में,WAH Dr.Ajay ji.
Comment by AVINASH S BAGDE on March 22, 2012 at 7:55pm
ऋतु बसंत पतझड़ पर, छा गयी गुलिस्ताँ में,WAH Dr.Ajay ji.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 22, 2012 at 7:51pm

bahut achchi bhaav poorn prastuti.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 22, 2012 at 6:25pm

काज़ल ने है बचाया, नज़र से ज़माने की ,

वो ख्वाब तुम्हारे हैं, ज़माने से मैं छिपाऊं .

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय अजय जी!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 22, 2012 at 5:38pm

bahut sundar bhav purn prastuti. aadarniya ajay ji. sadar badhai.

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