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वो खुद में इतना सिमटे-सिमटे थे
जैसे वो दिल को पकड़े-पकड़े थे |

उनको देख हुए थे बेसुध हम तो
क्या बात करें अब मुखड़े, मुखड़े थे |

ना तीर चला , ना ही तलवार चली
देखा तो दिल के टुकड़े-टुकड़े थे |

जाने किसका जादू चढ़ बैठा था
बेसुध थे सब,  सब उखड़े-उखड़े थे |

दिल ने आखिर दिल लूट लिया होगा 
उनके गेसू भी उलझे-उलझे थे |

-------- दिलबाग विर्क 

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Comment

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Comment by dilbag virk on March 17, 2012 at 9:12pm

त्रिपाठी जी आभार

मैं आपसे सहमत नही हूँ क्योंकि मैंने------- ए ------ का तुकांत लिया है , बाकि अन्य सुधीजनों के मत का इंतजार है 

स्नेह बनाए रखिए

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 17, 2012 at 9:01pm
एक अच्छी रचना के लिए दिल से दाद कुबूल करें विर्क साहब।शायद हिन्दी में तो तुकान्त(उर्दू में काफिया या बहर जो भी कहते हों)ही कहते हैं प्रस्तुत गजल उसमें नहीं लगती।

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