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फाग बड़ा चंचल करे, काया रचती रूप !
भाव-भावना-भेद को, फागुन-फागुन धूप !!

फगुनाई ऐसी चढ़ी,  टेसू धारें आग
दोहे तक तउआ रहे,  छेड़ें मन में फाग ॥

भइ, फागुन में उम्र भी करती जोरमजोर
फाग विदेही कर रहा, बासंती बरजोर !!

जबसे सींचित हो गये, बूँद-बूँद ले नेह ।
मन में फागुन झूमता, चैताती है देह !!

बोल हुए मनुहार से, जड़वत मन तस्वीर
मुग्धा होली खेलती, गुद-गुद हुआ अबीर ॥

धूप खिली छत खेलती, अल्हड़ खोले केश ।
इस फागुन फिर रह गये, बचपन के अवशेष ॥

करता नंग अनंग है, खुल्लमखुल्ले भाव
होश रहे तो नागरी,  जोशीले को ताव .. !

हम तो भाई देस के,  जिसके माने गाँव  ।
गलियाँ घर-घर जी रहीं - फगुआ, कुश्ती-दाँव ॥

****************
सौरभ 

 

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Comment

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Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 3, 2012 at 10:40am

mananiya saurabh ji aur yogi ji, sama bandh diya aap logo ne. sadar badhai


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 3, 2012 at 10:29am

नाच उठा आकाश भी, ऐसा उड़ा अबीर।
ताज नशे में झूमता,यमुना जी के तीर।१।
.
बरसाने की लाठियाँ, खाते हैं बड़भाग।
जो पावै सौगात ये, तन मन बागो बाग़।२।
.
तन मन पे यूँ छा गई, होली की तासीर।
राँझे को रँगने चली, ले पिचकारी हीर।३।
.
रंग लगावें सालियाँ, बापू भयो जवान।
हुड़ हुड़ हुड़ करता फिरे, बन दबंग सलमान।४।
.

होली के हुडदंग में, योगी राज उवाच।
पटिआले की भांग ने,फेल करी इस्काच।५।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 2, 2012 at 11:25pm

प्रदीपजी, आपने ’रचना’ को देखा, यह अभिभूतकरी है.

दोहा छंद में ये कुछ भावोद्गार हैं.

सादर.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 2, 2012 at 3:44pm

फाग बड़ा चंचल करे, काया रचती रूप !
भाव-भावना-भेद को, फागुन-फागुन धूप !!

sundar prastuti, badhai


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 1, 2012 at 1:30pm

भाई अविनाशजी तथा भाई संदीप ’वाहिद’, आपको प्रयास रुचा यह मेरे लिये परम संतोष की बात है.

सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 1, 2012 at 12:06pm

सादर नमस्कार,

आपके फागुनी दोहों ने हृदय प्रफुल्लित कर दिया है

धूप खिली छत खेलती, अल्हड़ खोले केश ।
इस फागुन फिर रह गये, बचपन के अवशेष ॥

बहुत ही सुंदर रचना,

Comment by AVINASH S BAGDE on March 1, 2012 at 11:38am

जबसे सींचित हो गये, बूँद-बूँद ले नेह ।
मन में फागुन झूमता, चैताती है देह !!

बोल हुए मनुहार से, जड़वत मन तस्वीर
मुग्धा होली खेलती, गुद-गुद हुआ अबीर ॥..Saurabh ji...शानदार दोहे हार्दिक बधाई !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 1, 2012 at 1:12am

भाई आशुतोषजी, आप सदा तरोताज़ा रहें ताकि इस मंच को भी ताज़ग़ी मिलती रहे.

आपको दोहे पसंद आये, इस हेतु आभार व्यक्त करता हूँ.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 1, 2012 at 1:10am

नीरज जी, आप अतिरेक में ही सही रचना पर नज़र डाले देते हैं यह मेरे लिये भी सौभाग्य है.

हार्दिक धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 1, 2012 at 1:09am

भाई अभिनवजी, प्रत्येक दोहे पर आपकी टिप्पणी अभिभूत कर गयी.

हृदय से आभार.

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