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चंडी रूप धारण किए
आँखों में दहकते शोले लिए
मुख से ज्वालामुखी का लावा उगलती
बीच सड़क में
ना जाने वह किसे और क्यों
लगातार कोसे जा रही थी
सड़क पर आने जाने वाले सभी
उस अग्निकुंड की तपिश से
दामन बचा बचा कर निकल रहे थे
ना जाने क्यों सहसा ही .....
मुझ में साहस का संचार हुआ
मैंने पूछ ही लिया
बहना....,
क्या माजरा है ?
क्यों बीच सड़क में धधक रही हो ?
उसकी ज्वाला भरी आँखों से
गंगा यमुना की धार बह निकली
रुंधे गले से उसका दर्द फूट पड़ा ...
भय्या !!!
एक कलमुंहे की पोल खोल रही हूँ ,
क्या किया उसने ? मेरा सवाल था ..
बोली... अभी सुनाती हूँ
पूरी दास्तान ,
मेरा बेकार पति
हर वक़्त मेरा खून और दारू पीता था ,
हफ्ते में इसकी दो चार रातें
गुज़रती थी थाने में
मैं थाने जाती थी - इसको छुड़ाती थी,
पैसा तो था नहीं ..
बस ....दरोगा की हो जाती थी ,
सिलसिला चलता रहा ये कल तक ,
आज फिर मेरा बेकार पति थाने में बंद है
लेकिन वो दरोगा.......
आज मेरी जगह
मेरी बेटी को मांग रहा है वो कमबख्त,
आज
या तो मैं खुद को मिटा दूंगी
या इसके रक्त से खप्पर भरूँगी,
भले कुछ हो जाए,
इस रक्तबीज को जिंदा नहीं छोडूंगी

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Comment

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Comment by आशीष यादव on August 26, 2010 at 7:45am
Yahi sahas hai. Aapne is taraf lekhni se ishara kiya, logo ka dhyanakarshit kiya. Samaaz ke thekedaaro ka chehra dikhaya, kaisa bhayanak hai. Bahut khub.
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on August 25, 2010 at 9:41pm
बहुत बढ़िया लिखा है आपने गुरु जी....मैं देख रहा हूँ की आज भी आपमें वो दम बरकरार है....

जय हो.....
ऐसेही लिखते रहिये गुरु जी.....
Comment by Rash Bihari Ravi on August 25, 2010 at 5:51pm
dhanyabad renu ji aapko hausala afjai ke liye
Comment by renu on August 25, 2010 at 4:51pm
क्या प्रतिक्रिया दू ????????????????

आप ने समाज के एक बहुत ही "विकृत रूप "को तरीके से सोचने के लिए परोस कर रख दिया है !
अब तो फैसला लेने के लिए उस चंडी रूपधारी महिला के समर्थन के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा और कुछ सूझना भी नहीं चाहिए !
मेरे पास अब, आप की सोच ,आप की समग्र सामाजीक दृष्टी या कह ले दृष्टीकोण और आप के कलम को प्रणाम करने के अलावा कुछ बचता नहीं ,
वैसे कहे तो , निःशब्द हु मै ,

प्रणाम है आप की लेखनी को
साधुवाद और धन्यवाद भी

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 25, 2010 at 2:45pm
एक बेबस और मजबूर नारी ज़रुरत पडने पर किस तरह से चंडी रूप धारण कर सकती है उसका बड़ा सुंदर चित्रण किया है गुरु जी आपने ! पढ़कर बहुत अच्छा लगा, आपको मुबारकबाद इस रचना के लिए !

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