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तैरता मन अब डूबने लगा है ....

अब सर से पानी निकलने लगा है
तैरता मन भी अब डूबने लगा है ॥

सूनी माँ की आंखों में , बेटे का इंतज़ार है
अब ,सिर्फ उनका ताबूत घर आने लगा है ॥

आशा लगाईं थी कुदाल ने , लाल कोठी पर
कपास के खेतों में भी अब दरार आने लगा है ॥

अब खाव्बो की मलिका , मरने लगी है
इच्छाओ का घर भी अब ,जलने लगा है ॥


मैं कुछ कर न सका दोस्तों, देश के लिए
इसका मलाल अब मुझे , आने लगा है॥

लाल कोठी-संसद

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Comment

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Comment by Sanjay Kumar Singh on July 25, 2010 at 2:04pm
Acchi Rachna , achha paryas, aur bhi sunder ban sakti thi yah kavita, phir bhi achhi hai, thanks sir,
Comment by suryajeet kumar singh on July 24, 2010 at 11:03pm
great job
Comment by Kanchan Pandey on July 24, 2010 at 6:07pm
मैं कुछ कर न सका दोस्तों, देश के लिए
इसका मलाल अब मुझे , आने लगा है॥
Badhiya likhey hai sir jee, desh key liyey karney kaa junoon aur naa karney ka malaal sabko honi chahiyey, thx.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 23, 2010 at 9:59am
बढ़िया लिखे है बब्बन भैया, एक जगह थोड़ा खटक रहा है, मेरे ख्याल से आप जो यह लाइन लिखे है ----सूनी माँ की आंखों में , बेटे का इंतज़ार है............वो ज़रा सा बदल के होने से भाव बढ़िया आ जा रहा हैं,------ माँ की सूनी आंखों में , बेटे का इंतज़ार है,
बाकी सब ठीक लगा ,खाव्बो.......इसमे जरा टाइपिंग mistake है,

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