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महक उठा है देखो आँगन (गीत-१२)-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

महक उठा है देखो आँगन, सुनकर ये संदेश।
साजन अपने घर लौटेंगे, छोड़ छाड़ परदेश।।
*
जाने कितने पुष्प पठाये सुनके वनखण्डी ने।
जिन से गूँथे गाँव सकारे सर्पिल पगडण्डी ने।।
पतझड़ में आया है गाने फागुन हँसकर गीत।
सूने मन के आँगन होगा अब ऋतुराज प्रवेश।।
*
पोंछ पसीना अँगड़ाई ले जगकर थकी क्रियाएँ।
सौंप रही मीठे सम्बोधन फिर से खुली भुजाएँ।।
करने को उद्यत मनुहारें, झील किनारे चाँद।
बनजारा सूरज ठहरा है, फिर सुलझाने केश।।
*
सब खुशियाँ हैं सेज सजाती, करती नव शृंगार।
भवन खँडहर देख वन रहा, नव जीवन आधार।।
रार छोड़कर काल दे रहा, विरहन को आशीष।
रात न होगी विधवा जैसी और न दिन दरवेश।।
*
हुआ सुरमयी पुनः सवेरा, औ' सरमीली साँझ।
आस जगी अब होगा उर्वर, ओना कोना बाँझ।।
उन्मत यह मन भँवरे जैसा, पीने को रसधार।
अवचेतन में भूल अगर हो, मत देना उपदेश।।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2023 at 3:27pm

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। गीत पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 25, 2023 at 6:10pm

बहुत ही सुन्दर और सरस गीत है आदरणीय ...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 16, 2023 at 3:26pm

आ. भाई श्यामनारायण जी, सादर अभिवादन। गीत पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Shyam Narain Verma on January 16, 2023 at 9:38am
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर गीत, हार्दिक बधाई l सादर

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