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ग़ज़ल (तुम्हारी एक अदा पर ही मुस्कराने की)

1212 / 1122 / 1212 / 22(112)

तुम्हारी एक अदा पर ही मुस्कराने की 

लगी है शर्त सितारों में जगमगाने की 

तुम्हारे आने से फिर लौट आई है रौनक़ 

भुला चुके थे अदा लब तो मुस्कुराने की 

तुम्हीं ने आ के ये वीराना कर दिया रौशन 

तमन्ना थी न ज़रा हमको झिलमिलाने की 

छुपा लूँ आओ तुम्हें मैं इन्हीं निगाहों में 

नज़र लगे न कहीं तुम को इस ज़माने की 

तड़प रहा है मेरी याद में मेरा मोहसिन 

सिखा के कारीगरी मुझको भूल जाने की 

चले ही जाएँगे ऐ दिल दिलासा देकर वो 

निभा रहे हैं कोई रस्म फिर ज़माने की 

हुआ नहीं है कभी नाख़ुनों से गोश्त जुदा 

ये किस ने तुमसे कही बात छोड़ जाने की 

बता रहा है वो नुक़्सान मय-कशी के अब

दिखा के राह मुझे ख़ुद शराब-ख़ाने की 

तुम्हारी यादों के मिटते नहीं निशाँ दिल से 

'अमीर' कर के रहे कोशिशें मिटाने की 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 14, 2022 at 4:14pm

आदरणीय महेंद्र कुमार जी, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का तह-ए-दिल से शुक्रिया।

Comment by Mahendra Kumar on October 13, 2022 at 8:06pm

उम्दा ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय अमीरुद्दीन जी। हार्दिक बधाई प्रेषित है।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 4, 2022 at 10:57pm

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 4, 2022 at 8:01pm

बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीय अमीरुद्दीन जी बधाई...

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 1, 2022 at 4:26pm

मुहतरम रवि भसीन 'शाहिद' साहिब, ग़ज़ल पर आपकी आमद और ज़र्रा नवाज़ी का तह-ए-दिल से शुक्रिया.. सादर।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on October 1, 2022 at 2:45pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब, बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने, इस पर आपको दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर

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