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गज़ल
221 2121 1221 212

अख़लाक पर मुहब्बत  भरोसा रहा नहीं
हमदम रहा कोई कहाँ जानाँ हुआ नहीं

दिल जानता है तुझसे अभी प्यार भी कहाँ
जो बिक चुका है वो जहाँ तो मन बसा नहीं

लगता उन्हे नहीं है वो दरकार भारती
गर चाहिए है मुल्क तो मौसम रहा नहीं

गुलदस्ता हिन्दुस्तान है था और होगा भी
क़मज़र्फ था सदा वो तो भाई हुआ नहीं

औरंगजेब तेरा तो राणा हमारा है
मत खेल तू ज़मीर से माँ का हुआ नहीँ

क़मज़ोर नस हमारी तो तहजीब है जहाँ
जो मार काट करता वो हारा रहा नहीं ।

अब नींद से उठो कि वो आतंक द्वार है
हम डूबे ही रहे नशे खाना हुआ नहीं

चेतन सुना है तुमने ये सरकार और है
कलोल है नहीं वो लानत अमा नहीं

मौलिक व अप्रकाशित

प्रोफ. चेतन प्रकाश 'चेतन'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2022 at 6:52am

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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