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दिल से दिल की हो गई, दिल ही दिल में बात ।
दिल तड़पा दिल के लिए, मचल गए जज़्बात ।
दिल में दिल की जीत है, दिल में दिल की हार -
दिल को दिल ही दिल मिली, धड़कन की सौगात ।

2.

काल गर्भ में है निहित, कर्म फलों का राज़।
अंतस में गूँजे सदा,  कर्मों की आवाज़ ।
कर्म प्राण है जीव का, कर्म जीव की आस -
अच्छे कर्मो से करो, जीने का आगाज़ ।


सुशील सरना / 27-12-21

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on January 7, 2022 at 2:15pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ सर ।
Comment by Sushil Sarna on January 7, 2022 at 2:15pm
आदरणीय समर कबीर जी आदाब, सृजन आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभारी है सर ।विलम्ब के लिए क्षमा । आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ सर ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 5, 2022 at 8:48pm

आ. भाई सुशील जी, सुन्दर मुक्तक हुए हैं । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on December 30, 2021 at 3:55pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब , अच्छे दोहा मुक्तक हुए हैं , बधाई स्वीकार करें I 

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