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कुछ बदला-बदला सा ये जहां नज़र आता है, 

राह अब भी है वही पर, अजनबी सा नज़र आता है

तन तो हमेशा ही अपना था मगर,

न जाने क्यों अब पराया सा नज़र आता है

 

ज़िंदगी को हमने कुछ यूं गुज़रते देखा

जैसे रेत को बंद मुट्ठी से फिसलते देखा

ज़ोर जितना भी लगाया रोकने मे उसे

छोटे से छेद से जिंदगी को निकलते देखा

एक आहट सी हुई किसी के आने की जैसे

साँसो मे घुल सी गयी किसी की खुशबू जैसे

इस खुशबू से मेरा वास्ता एक अरसे से रहा

रूह मे समा गयी हो कोई भूली सी तस्वीर जैसे

किसी के आस मे हम ये नज़रें बिछाये बैठे है

वैसे तो खत्म हैं फिर भी खुद को जिलाए बैठे है

कुछ पल को ही सही सुकूने-रूह मिल जाए

इसी इंतज़ार मे अपने जनाज़े से कहीं दूर जाकर बैठे है

हर बीतता पल अगले को कुछ बोल गया

सब खाली ही रहना है राज़ ये खोल गया

चाहे जितना भी समेटों तुम राहे-ज़िंदगी मे

झोली मे छेद है सभी के पर सबका ईमान डोल गया

अपने सर पर कर्ज़ तमाम रक्खा है

अपनी झोली से ज्यादा समान रक्खा है

मंजिल हैं दूर और राह जरा भी आसान नहीं

हमने सितारों से आगे अपना मुकाम रक्खा है

मिलना ही चाहो तो कोई भी दूर नहीं होता

 जो दिल  से हो मजबूर कभी मगरूर नहीं होता

वैसे तो कई बहाने हैं न मिलने के लेकिन

फितरत से जो खुश हो गमो से चूर नही होता

"मौकिल व अप्रकाशित"

अमन सिन्हा 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2021 at 6:22am

आ. भाई अमन जी, अभिवादन। अच्छी प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by AMAN SINHA on October 2, 2021 at 11:09am

@विजय निकोरे साहब, 

धन्यवाद 

Comment by vijay nikore on September 30, 2021 at 12:47pm

पढ़ कर आनन्द आ गया।

बधाई

Comment by AMAN SINHA on September 28, 2021 at 9:53am

@समर कबीर साहब, 

धन्यवाद 

Comment by Samar kabeer on September 27, 2021 at 4:11pm

जनाब अमन सिन्हा जी आदाब, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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