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स्वार्थ रस्ता  रोके बैठे है.....!

कई दिनों से सोन चिरैया

गुमसुम  बैठी रहती  है

देख रही चहुँ ओर कुहासा

भूखी घर बैठी रहती है

चौराहे पर बंद  लगे हैं

स्वार्थ रस्ता  रोके बैठे हैं !

कितने बच्चे कितने बूढ़े

कितनों के रोज़गार छिने हैं

लोग मर गए  बिना दवा के

हार गए जीवन से हैं...

जंतर मंतर रोज  रचे हैं 

हँसते हँसते रो दे ते हैं  !

तोड़ रहे  कानून  देश  का 

राग  अलापें तोड़ फोड़ का 

बिना बात ये शोर मचाएं

सियासत सदा खेल  होड़ का

रंग  बिरंगी जुड़ बैठे  हैं 

जादूगर ये खुद गुर के हैं !

धुंध पड़ी  है बीच  रास्ते 

 सूरज का  रस्ता  हैं रोके 

इन्द्र धनुष चाहे है रोना

ओस बिक गयी अँधेरों सस्ते

कब तक भारत खेल  चलेगा

किसान तो चहुंओर डटे हैं....!

चौराहे पर बंद लगे हैं 

स्वारथ  रस्ता रोके  बैठे हैं  ! 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Chetan Prakash on February 12, 2021 at 6:53am

नमन, आदरणीय, प्रधान सम्पादक महोदय, मेरी रचना गीत को ग्रुप में फीचर करने हेतु कोटिशः धन्यवाद स्वीकार करें। आशा है, आपकी कृपा सदैव बनी रहेगी ।

Comment by Chetan Prakash on February 12, 2021 at 6:37am

नमन, भाई लक्ष्मण सिंह धामी 'मुसाफिर', गीत आपकी प्रशंसा पा सका रचना-कर्म धन्य हुआ। अशेष आभार !

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2021 at 9:05pm

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन । मनमोहक रचना हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Chetan Prakash on February 2, 2021 at 6:42pm

आदाब,  आदरणीय समर कबीर  साहब,  आपकी  महती कृपा गीत  पर हुई  और  आपकी  सराहना  मुझे मिली , इसके लिए  हृदय -तल से  आपका  आभारी  हूँ, मोहर्रम । वन्दे !

Comment by Samar kabeer on February 2, 2021 at 5:42pm

जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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