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ग़ज़ल नूर की- मेरी आँखों में तुम को ख़ाब मिला?

मेरी आँखों में तुम को ख़ाब मिला?
या निचोडे से  सिर्फ आब मिला.
.

सोचने दो मुझे समझने दो
जब मिला बस यही जवाब मिला.
.

दिल ने महसूस तो किया उस को   
पर न आँखों को ये सवाब मिला.
.

मैकदे में था जश्न-ए-बर्बादी
जिस में हर रिन्द कामयाब मिला.
.

इतना अच्छा जो मिल गया हूँ मैं
इसलिए कहते हो “ख़राब मिला.”
.

“नूर” चलने से पहले इतना कर
अपने हर कर्म का हिसाब मिला.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित  

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 8, 2021 at 12:31pm

धन्यवाद आ. बृजेश जी 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 3, 2020 at 8:40pm

वाह बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीय नीलेश जी...

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 2, 2020 at 5:07pm

धन्यवाद आ. सालिक जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 2, 2020 at 5:07pm

आ. रूपम जी,

शाइरी भी तो इशारों ही में होती है ..
सादर 

Comment by सालिक गणवीर on November 2, 2020 at 12:15pm

आदरणीय भाई निलेश जी
सादर अभिवादन
बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने ,दाद के साथ मुबारक़बाद पेश करता हूँ

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 1, 2020 at 3:36pm

धन्यवाद आ. लक्ष्मण जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 31, 2020 at 5:36pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । एक और उत्तम गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2020 at 5:12pm

धन्यवाद आ. मीत जी..
आपके सवाल का जवाब आपको आपके विवाह के बाद मिल जाएगा :) :) :-)

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2020 at 5:11pm

धन्यवाद आ. समर सर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2020 at 5:11pm

धन्यवाद आ. तेजवीर सिंह साहब 

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