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तुम्हीं आये हरदम टहलते हुए.- ग़ज़ल

मापनी 

१२२ १२२ १२२ १२ 

 

कई ख़्वाब देखे मचलते हुए.

तुम्हीं आये हरदम टहलते हुए.

 

तबस्सुम के पीछे छिपे कितने ग़म,

कभी मोम देखो पिघलते हुए.

 

जहाँ भी हमें सत्य बेबस मिला,

वहीं पर दिखा झूठ फलते हुए.

 

कभी कुछ न सोचा तुम्हारे सिवा, 

मुहब्बत की राहों पे चलते हुए. 

 

जो तुमने बुलाया हमें चाय पर, 

चले आये हम भी उछलते हुए. 

 

अगर सच कहें तो मजा आ गया,

जो देखा रकीबों को जलते हुए.

 

मुहब्बत की राहें न आसान थीं,   

मैं मंजिल पे पहुँचा सँभलते हुए.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 3, 2020 at 8:04pm

आदरणीय आशीष यादव  जी सादर नमस्कार

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by आशीष यादव on August 26, 2020 at 1:45am

वाह, क्या बात है। बहुत खूब। बधाई स्वीकार हो।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 18, 2020 at 8:39pm

 

आदरणीय Madhu Passi 'महक'  जी सादर नमस्कार

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 18, 2020 at 8:38pm

आदरणीय समर कबीर जी सादर नमस्कार

बहुत दिनों के बाद आपकी उपस्थिति एवं हौसला अफजाई को सादर नमन 

Comment by Madhu Passi 'महक' on August 18, 2020 at 6:28pm

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी सादर नमस्कार!उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद। 

Comment by Samar kabeer on August 17, 2020 at 4:37pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 13, 2020 at 11:01am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 13, 2020 at 7:43am

आ. भाई बसंतकुमार जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

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