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भारतवर्ष क्रांतिकारी महापुरुषों और वीरांगनाओं से भरा पड़ा है जिनके बारे में जितना पढ़ा जाये कम ही नजर आता है| कभी-कभी तो ऐसा लगता है पता नहीं किस मिट्टी के बने होते होंगे वे लोग जो देश के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने ले लिए हर वक़्त तैयार रहते थे| इस संघर्ष में उच्च, पिछड़े समाज और दलित समुदायों से आने वाली औरतों के साथ-साथ बहुत सी भटियारिनें या सराय वालियां, तवायफे भी थीं| जिनके सरायों में विद्रोही योजनाएं बनाते थे जाने कितनी तो कलावंत और तवायफ़ें भी जो इस आजादी के संग्राम में मददगार थीं| उन्होनें भी अपना सब कुछ त्याग कर बस आजादी को ही अपने जीवन का देय बना लिया था| जिस किसी व्यक्ति या महिला में देशप्रेम एवं देश के लिए मर मिटने की तमन्ना होती है, वह वरण्य होता है। मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है, वह अपने सद्कार्य से इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान बना सकता है। ऐसा कहा जाता है कि संकट के समय दिव्य आत्माओं का जन्म होता है, जो जन साधारण को सत्कार्यों की प्रेरणा देती रही है और आगे भी देती रेहेंगी। झाँसी की रानी की लोकप्रियता की वजह यह भी मानी जा सकती है कि वे मौखिक परंपरा और लोकगीतों में जीवित रहीं दूसरा वह एक भ्रांत समाज से संबंध भी रखती थी| झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को लेकर दर्जनों लोकगीत रचे गए, जो आज भी गाए जाते हैं| यहाँ पर प्रश्न उठता है कि उन महिलाओं का क्या जो अपना सब कुछ लूटा देने के बाद भी हमारे पुरुष प्रधान समाज के द्वारा भुला दी गई जिनके त्याग और बलिदान के बारे कोई बात करने को तैयार नहीं, क्यों? वे सब एक ऐसे समाज से आई थी जिनका समाज हमारे सभ्य समाज के अनुरूप नहीं था या फिर उनके बारे में इतिहास में ज्यादा कुछ लिखा ही नहीं गया| कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे सभ्य समाज में उनके बारे में लिखना ही जरूरी नहीं समझा जो भी हो आज हम ऐसी वीर नारियों के लिए जानकारी जुटाने में असमर्थ हो जाते है जिन्होनें इन स्वाधीनता के युद्धों में अपना कोई निजी हित ना होते हुए भी क्रांतिकारियों की सहायता करने में अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था फिर भी उन्होंने कभी किसी से भी किसी भी तरह की कोई शिकायत नहीं की| अंग्रेजी सरकार ने जिनके कोठो सहित उनके सभी आसियानों पर निर्दयता से अपनी पूरी ताकत से प्रहार किया जहां ये तवायफे हिंदुस्तान की पुरानी तहजीब, सभी ललित कलाओं में प्रवीण और उनकी संरक्षक मानी जाती रही थी| अब अंग्रेजों ने उनकी हैसियत केवल एक साधारण सी वैश्या बना कर रख छोड़ा था| ऐसे ही समाज से आई वीरांगनाओं की श्रेणी में एक नाम अजीजन बाई का भी आता है| अजीजन बाई का वास्तविक नाम तो अंजुला था लेकिन इतिहास ने अजीजन बाई के नाम से ही उन्हें संबोधित किया है|

 

       इतिहासकारों के अनुसार अजीजन बाई का जन्म 22 जनवरी 1824 को मध्यप्रदेश में मालवा क्षेत्र के राजगढ़ में एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ था| उसके पिता का नाम शमशेर सिंह था और वे एक बड़े जमींदार थे| अजीजन बाई बचपन से रानी लक्ष्मीबाई की तरह पुरुषों के लिबास पहना करती थीं व उनसे बहुत ही प्रभावित थी| वे अक्सर एक जोड़ी बंदूक रखती और सैनिकों के साथ घोड़े की सवारी करती थीं| अजीजन बाई एक प्रसिद्ध नर्तकी थी उनके सुरीले संगीत एवं नृत्य से हज़ारों युवक आकर्षित होते थे। उस समय उनका नाम देश की बहुत ही प्रतिभा सम्पन्न नर्तकियों में आता था धन संपत्ति की उनके पास कोई कमी नहीं थी| अजीजन बाई केवल एक साधारण नर्तकी ही बन कर रहना नहीं चाहती थी वह अपने देश के लिए कुछ करना भी चाहती थी| अब उनके हृदय में देशभक्ति की भावनाएँ भी हिलोरें भर रही थीं। प्रथम स्वाधीनता संग्राम की क्रांति की चिंगारी बढ़ते-बढ़ते कानपुर तक भी दस्तक दे चुकी थी। अजीजन बाई जानती थी कि शक्तिशाली अंग्रेज़ सैनिकों को पराजित करना कोई आसान काम नहीं है फिर भी उन्होंने देश की आज़ादी के लिए क्रांतिकारियों की अपनी ओर से पूरी सहायता करने का निश्चय किया। अजीजन बाई ने भी सोचा कि मुल्क खतरे में है, इसके लिए उन्हें भी कुछ करना चाहिए| तभी उन्होंने भी अपने गहने, धन-दौलत आदि क्रांति में पड़ने वाली सभी जरूरत की चीजें क्रांतिकारियों को प्रदान कर मातृभूमि में अपना योगदान करने की पूरी कोशिश की। अजीजन बाई ने आसपास के चकलो की लगभग सभी तवायफों को एकजुट किया जिसमें उनकी अपनी नारी सैनिको की भी टोली थी जिसका नाम मस्तानी टोली रखा| उस टोली में सम्मिलित स्त्रियाँ पुरूष वेश में तलवार लिए घोड़ों पर चढ़कर नवयुवकों को क्रांति में भाग लेने की प्रेरणा देती व निडरतापूर्व सशस्त्र जवानों का हौसला आफ़जाई करती था| उनके जख़्मों पर मरहम पट्टी करने के साथ-साथ उन्हें हथियार और गोला-बारूद मुहैया कराता था| अजीजन बाई कानपुर में तैनात दूसरी घुड़सवार सेना की बहुत चहेती थीं| दुश्मन पर बंदूक चलाने के लिए विशेष तौर पर बनाई गई जगह जिसे व एक गन बैटरी का नाम दिया गया था को हथियार और गोला-बारूद का मुख्यालय बना दिया| कानपुर की घेराबंदी के पूरे दौर में वे सैनिकों के साथ थीं, जिन्हें वे अपना दोस्त मानती थीं और ख़ुद भी हमेंशा पिस्तौल लिए रहती थीं| इस देश भक्ति के कारण वह नाना साहब की शुरुआती जीत पर कानुपर में झंडा फहराने वाले जुलूस में भी शामिल थीं| वीर विनायक दामोदर सावरकर ने अजीजन के सम्बन्ध में लिखा है कि अजीजन एक नर्तकी थी, परन्तु सिपाहियों को उससे बेहद स्नेह था। अजीजन का प्यार साधारण बाजार में धन कमाने के लिए नहीं बिकता था, उनका प्यार पुरस्कार स्वरूप उस व्यक्ति को दिया जाता था, जो देश से प्रेम करता था| अजीजन बाई के सुन्दर मुख की मुस्कराहट में एक अजीब सा जादू था जो हारे हुए सिपाहियों के हृदय में साहस और युद्ध में जीतने की प्रेरणा भर देती थी। उनके मुख पर आई हुई भृकुटी का तनाव युद्ध से भागकर आए हुए कायर सिपाहियों को भी पुनः रणक्षेत्र की ओर भेज देता था

 

       एक बार अंजुला अपनी सहेली हरी देवी के साथ मेले से आ रही है तभी कुछ अंग्रेज सैनिकों ने अंजुला को उसकी सहेली के साथ ही अपहरण कर लिया| अंजुला के पिता शमशेर सिंह को जब इसका पता चला तो उन्होंने दोनों लड़कियों को छुड़ाने का बहुत प्रयास किया| वह अंग्रेज उच्चाधिकारियों से फ़रियाद करते रहे कि लड़कियों को छोड़ दे लेकिन अंग्रेज़ अधिकारियों ने लड़कियों को छोड़ने के बजाए सैनिकों की शिकायत करने के अपराध में शमशेर सिंह की जमीदारी ही छीन ली| अपनी पुत्री और जमीदारी चली जाने के गम में शमशेर सिंह का प्राणांत हो गया| इस तरह उसे और उसके पिता को कहीं से भी मदद ना मिलने के कारण अजीजन बाई हताश हो गई फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी| एक दिन मौक़ा मिलते ही किसी तरह अंजुला और उसकी एक सहेली हरी देवी अंग्रेजों की कैद से निकलने में कामयाब हो गई| इस तरह अंग्रेजों से बचने का कोई उपाय ना दिखने पर उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए यमुना नदी में छलांग लगा दी| यमुना में छलांग लगाने में हरी देवी की मृत्यु हो गई लेकिन अंजुला को एक मुस्लमान पहलवान ने बचा लिया| वह मुस्लमान अय्यास और विलासी प्रकृति का था, उसने अंजुला को कानपुर ले जाकर अम्मीजान के कोठे पर बेच दिया जो उस समय की मशहूर तवायफ मानी जाती थी| अम्मीजान ने अंजुला का धर्म परिवर्तन करा कर मुस्लमान बना दिया| इस प्रकार उन्हें अंजुला से अजीजन बाई बन कर उसे मजबूरी में एक तवायफ बनाना पड़ा| वह दिल की बेहद उदार और अपने वतन से बेपनाह मोहब्बत करने वाली स्त्री थी, ईश्वर ने उन्हें नृत्य और कला का अद्भुत मिश्रण दिया था। तवायफ की सभी कलाओं को सीखकर व अपनी खूबसूरती के कारण जल्द ही पूरे अवध की मशहूर तवायफ बन गई| जिसे सम्मान जनक पेशा नहीं माना जाता है कालांतर में उमराव जान ने भी उन्हीं से नृत्य सीखा था| इसके बाद अंजुला समाज में अजीजन बाई के नाम मशहूर हो गई|

      

       प्रथम स्वाधीनता के वक्त क्रांति की लहर पूरे देश में धधक रही थी, देश का हर वीर सैनिक और क्रांतिकारी अपनी मातृभूमि पर सब कुछ त्याग कर रहा था| अब मस्तानी टोली की सभी तवायफें अंग्रेजों की छावनी में भी नृत्य प्रदर्शन के लिए जाकर, वहां से जानकारी हासिलकर क्रांतिकारियों को पहुंचाने का काम करने लगी| शक के दायरे में आने पर अंग्रेजों ने बिठुर में बहुत सारी औरतों और बच्चों को मार दिया| उनकी हत्या का बदला लेने के लिए क्रान्तिकारियो के साथ मिलकर अजीजन बाई और नारी सैनिक की मस्तानी टोली ने बीबी घर में सुरक्षित बहुत सारी अंग्रेज औरतों व बच्चों को मार कर कुएं में फेंक दिया| इसकी भनक जब अंग्रेजों को मिली तो उन्होंने सभी तवायफों के मोहल्ले को सैनिक टुकड़ी से घेर लिया और बहुत सारी तवायफो को मार दिया और कुछ को गिरफ्तार कर लिया लेकिन अजीजन बाई किसी तरह वहां से निकल भागने में सफल हो गई| अजीजन बाई वहां से बच निकलने के बाद नाना साहब पेशवा के वकील अजीमुल्ला खाँ के पास पहुंची, तब उन्होंने ही उसे पहली बार नाना साहब और तात्या टोपे से मिलवाया|

 

       अजीजन बाई के जीवन की दास्ताँ सुनने के बाद नाना साहब को लगा कि अजीजन बाई एक कुलीन परिवार से है, उन्हें ये सब बहुत ही मजबूरी में करना पड़ा तो उन्होंने उसे अपनी बहन मान लिया| अजीजन बाई को एक तलवार भेंट करतें हुए उन्होंने उससे राखी बंधवा ली| इसके बाद अजीजन फिर से अजीजन बाई से अंजुला बन गई, उसकी सैनिक टुकडी मस्तानी टोली में पच्चीस सदस्य थी जो सभी पुरानी तवायफें थी| अजीजन बाई ने उन सभी को अस्त्र-शस्त्र, घुड़सवारी व बन्दुक चलाने का प्रशिक्षण देकर अपनी सैनिक टुकड़ी मस्तानी टोली में शामिल कर लिया| अब अंजुला की मस्तानी टोली क्रांतिकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलकर अंग्रेजों का मुकाबला करने लगी| कानपुर में नाना साहब, राव साहब तथा तात्या टोपे क्रांति के नेतृत्व में 1 जून, 1857 ई. को क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक आयोजित की गई जिसमें शमसुद्दीन खाँ, सूबेदार टीका सिंह, अजीमुल्ला खाँ के अतिरिक्त अजीजन बेग़म ने भी भाग लिया था। इस बैठक ने सभी ने क़सम खाई कि हम जब तक जिंदा है अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ लड़ते रहेंगे और अब भारत से अंग्रेज़ सत्ता को समाप्त करके ही दम लेंगे। इसके बाद शमसुद्दीन खाँ ने 2 जून 1857 को अजीजन के घर जाकर उनसे भेंट की और बताया कि जल्द ही भारत से कंपनी का शासन शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा। यह सुनकर वीरांगना अजीजन का हृदय कमल की भाँति खिल उठा इससे पता चलता है कि उसमें देश भक्ति की कितनी आग थी। वह तात्या टोपे से बहुत प्रभावित थी और उनके किस्से सुनकर उन्हीं का अनुसरण करने लगी| महाराजपुर की लड़ाई में अंजुला ने ही तात्या टोपे की जान बचाई और वहां से निकलने में उनकी मदद की थी|

 

       प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बिठुर के लंबे संघर्ष के समय अधिकतर क्रांतिकारी भूमिगत हो गए तो अंजुला भी पुरुष वेश में जंगल में छुप गई| जब वह एक कुएं से पानी पी रही थी तभी वहां कुछ अंग्रेज सैनिक आ गए| अंग्रेजों सैनिकों ने उसके खुले बाल देख कर उसको पहचान लिया कि यह सैनिक के भेष में अजीजन बाई है| इस खूनी संघर्ष में अजीजन बाई ने उन सभी को मार गिराया तभी हयूरोज की बंदूक से निकली एक गोली उसके कंधे में लग गई| ह्यूरोज के बचे अंग्रेज सनिकों द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब वह अंग्रेज अधिकारियों के सामने लाई गईं तो उनकी खूबसूरती और कला की इज्जत रखते हुए उन्हें मशवरा दिया गया कि वह सिर्फ यहीं बता देंगी कि उन्होंने किसे मदद पहुंचाई है तो उनके सभी गुनाह माफ करके अपमानित शहर में रहने दिया जाएगा। यह सुनकर अजीजन बाई मुस्कराईं और बोलीं भले ही तुम मेरी जुबान खींच लो, मगर खूबसूरत गजलें गाने वाली यह जुबान उफ़्फ़ भी नहीं करेगी। मेरी खाल खींच लो, यह खूबसूरत खाल जिस पर जमाना आहें भरता है, उसे इसकी जरा भी फिक्र नहीं होगी। भले तुम मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दो, हर टुकड़ा जो कुदरत के दिए नायाब हुनर की गवाही है, वह शिकवा भी नहीं करेगा। इतना ही नहीं उस शेरनी ने हुंकार भर कर कहा कि माफी तो अंग्रेजों को मांगनी चाहिए जिन्होंने भारतवासियों पर इतने जुल्म किए हैं। अंग्रेजों के इस अमानवीय कृत्य के लिए वह जीते जी उन्हें कभी माफ नहीं करेगी। एक नर्तकी से ऐसा जवाब सुनकर अंग्रेज अफसर तिलमिला गए और उसे मौत के घाट उतारने का आदेश दे दिया गया। देखते ही देखते अंग्रेज सैनिकों ने उसके शरीर को गोलियों से छलनी कर दिया। अजीजन बाई के द्वारा किए इस बलिदान को सदा इतिहास में याद किया जाएगा| यह बड़े दुख की बात है आज भी ऐसे वीर लोगों के बलिदान को उनके व्यवस्यों के रूप में तोल कर देखा जाता है जबकि उनकी देश भक्ति अच्छे अच्छे देश भक्तों को भी लज्जित कर देती है| हमारा समाज आज भी उन्हें और उनके त्याग को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है फिर भी नारी समाज में उनका अपना खुद का एक आदरणीय स्थान है| जब-तब वीर-वीरांगनाओं की बात चलेगी तो अजीजन बाई को भी याद किया जाएगा |

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 26, 2020 at 10:59am
बहुत सुन्दर आलेख, वीरों का सदा मान होना ही चाहिए, देश हित सर्वोपरि है, नमन ऐसे विभूतियों को

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