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दीप बन मैं ही जला....(गजल)

2122 2122 212

दीप बन मैं ही जला हूँ रात-दिन
रोशनी खातिर लड़ा हूँ रात-दिन।1

जब कभी मन का अचल पिघला जरा
नेह बन मैं ही झरा हूँ रात-दिन।2

जब समद निज आग से उबला कभी
मेह बन मैं ही पड़ा हूँ रात-दिन।3

कामनाएँ जब कुपित होने लगीं
देह बन मैं ही ढहा हूँ रात-दिन।4

व्योम तक विस्तार का पाले सपन
यत्न मैं करता रहा हूँ रात-दिन।5

आखिरी दम का सफर जब सालता
गीत बन मैं ही बजा हूं रात - दिन।6

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on June 22, 2020 at 9:37pm

आभार आदरणीया अन्विता जी।

Comment by Manan Kumar singh on June 22, 2020 at 9:36pm

आभार आदरणीय समर जी।

Comment by Anvita on June 22, 2020 at 9:34pm
आदरणीय मनन कुमार सिंह जी. आपकी रचना "दीप बन.."के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।सादर अभिवादन ।अन्विता
Comment by Samar kabeer on June 21, 2020 at 2:55pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

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