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2122 1212 22 /112

सिर्फ़ कुर्सी का रास्ता हूँ मैं
यूं रियाया का रहनुमा हूं मैं

आदमी हूं अना है ग़ैरत है
फिर भी वक़्त आने पर बिका हूं मैं

रसन-ए-जोर-ओ-ज़ुल्म इतनी चली
रह गया ढांचा घिस गया हूं मैं

जश्न-ए-आज़ादी हूं मैं कैसे कहूँ
लगता है जैसे हादसा हूँ मैं

तोड़ पत्थर में बन गया पत्थर
अलविदा ख़ाब कह चुका हूं मैं

मुफ़लिसी का न ज़ात-ओ-मज़हब है
ये अगर कह दूं तो बुरा हूं मैं

जेब मुफ़लिस की.. दिल अमीरों का
ये न भरती कि थक गया हूं मैं

हुस्न के जल्वे देख देख अभी
कोई मंज़र हसीं बना हूं मैं

छोड़ ख़्वाब-ए-सियासत अब तो 'क़दम'
जिससे चाहा न मिल सका हूं मैं

क़दम जयपुरी
जयपुर

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना

Views: 817

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Comment by TEJ VEER SINGH on May 14, 2020 at 9:44am

हार्दिक बधाई आदरणीय क़दम जयपुरी जी। बेहतरीन गज़ल।

जश्न-ए-आज़ादी हूं मैं कैसे कहूँ
लगता है जैसे हादसा हूँ मैं

तोड़ पत्थर में बन गया पत्थर
अलविदा ख़ाब कह चुका हूं मैं

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 14, 2020 at 6:33am

आ. ओमप्रकाश जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Om Prakash Agrawal on May 14, 2020 at 3:41am
आदरणीय विजय निकोरे जी,
सराहना हेतु साभार धन्यवाद।
Comment by Om Prakash Agrawal on May 14, 2020 at 3:41am
आदरणीय कबीर साहब,
आपका सुझाव और सराहना बहुत बहुमूल्य है । हृदय से आभारी हूँ।
अपेक्षित सुधार करूंगा।
सामार धन्यवाद
Comment by vijay nikore on May 13, 2020 at 2:00pm

आ० कदम जयपुरी जी, गज़ल पढ़ी, लय अच्छी लगी। बधाई आदरणीय।

भाई समर कबीर जी, आपकी प्रतिक्रियाओं से मुझको अक्सर बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है। दिल से शुकिया।

Comment by Samar kabeer on May 13, 2020 at 11:53am

जनाब क़दम जयपुरी जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'यूं रियाया का रहनुमा हूं मैं'

इस मिसरे में 'रियाया' ग़लत है,सहीह शब्द है "रिआया" देखियेगा ।

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