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क्षणिकाएँ :

थरथराता रहा
एक अश्क
आँखों की मुंडेर पर
खंडित हुए स्पर्शों की
पुनरावृति की
प्रतीक्षा में


बहुत सहेजा
अंतस के बिम्बों को
अंतर् कंदरा में
जाने
किस बिम्ब के प्रहार से
बह निकला
आँखों के
स्मृति कलश से
गुजरे पलों का सैलाब

तुम्हें
पता ही नहीं चला
तुम जन्मों से
कर रहे हो
वरण
सिर्फ़
मृत्यु का

हर कदम से पहले
हर कदम के बाद

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by vijay nikore on April 10, 2020 at 5:29am

आपकी क्षणिकाएँ मन को भा गईं। इस विधि पर आपकी कलम सधी हुई है।हार्दिक बधाई, मित्र सुशील जी।

कृपया ध्यान दे...

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