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राजनीति की धार हमेशा -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२२२/२२२२/२२२२/२२२


हर शासन अब गद्दारों को यार बहुत हितकारी है
जो करता है बात देश की उसको बस लाचारी है।१।

**
सर्द हवाओं के चंगुल में ठिठुराती आशाएँ बैठी 
सुन्दर सपनों की खेती पर पाला पड़ता भारी है।२।

**
पहले लगता था हम जैसा गम का मारा कोई नहीं
पर जब देखा पाया दुनिया हमसे भी दुखियारी है।३।

**
तुमको भी पत्थर आयेंगे वक्त जरा सा ढलने दो
हम आगे की सरहद पर हैं आज हमारी बारी है।४।

**
नहीं अकेले तुम हो घायल हम भी इसके मारे हैं
राजनीति  की  धार  हमेशा  होती  यार दुधारी है।५।

**
माना सभ्य जमाना लेकिन दुर्गुण से ये दूर नहीं
जाति धर्म तो जीत के बैठे बस मानवता हारी है।६।

मौलिक.अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 8, 2020 at 6:38pm
आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार ।
Comment by Samar kabeer on February 8, 2020 at 3:07pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुआफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 6, 2020 at 6:58pm

आ. भाई सुरेंद्रनाथ जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by नाथ सोनांचली on February 6, 2020 at 5:13am

आद0 लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन। बढिया रचना बन पड़ी है। बधाई स्वीकार कीजिये

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