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मेरा आँगन गुँजाती है नन्ही परी ।
पंछी बन चहचहाती है नन्ही परी ।

उसकी मुस्कान से फूल सारे खिले
हँस के गुलशन सजाती है नन्ही परी ।

पंखुड़ी सी नज़ाकत को ओढ़े हुए
मेरा मन गुदगुदाती है नन्ही परी ।

सुबह की गुनगुनी धूप जैसी निखर
पूरा घर जगमगाती है नन्ही परी ।

अपनी आँखों में झिलमिल सितारे लिए
स्वप्न अनगिन जगाती है नन्ही परी ।

बाँसुरी की मधुर तान सी लोरियाँ
मेरे होठों पे लाती है नन्ही परी ।

मिसरी जैसी सुना तोतली बोलियाँ
मन में घुल-घुल सी जाती है नन्ही परी ।

मेरे जीवन की है सबसे सच्ची दुआ
आरती सी सुहाती है नन्ही परी।

थाम आँचल मेरा, हौसला हर बड़ा
मुझको जीना सिखाती है नन्ही परी ।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on February 17, 2016 at 3:08pm

आदरणीय सौरभ सर ऐसी चर्चा हर पाठक के लिए उसके सृजन को गहनता से निखारने में अत्यंत लाभकारी होती है। आपके द्वारा प्रवाहित इस ज्ञान गंगा हेतु मैं व्यक्तिगत रुप से आपका आभार प्रगट करता हूँ। सीखने और सिखाने का इस मंच पर अनुपम संगम होता है। हार्दिक आभार सर। 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 17, 2016 at 2:36pm

अब ’भाव प्राकट्य’ का नाम ही ’उक्ति-विस्फोट’ या ’भाव-विस्फोट’ है तो क्या किया जा सकता है, आदरणीया प्राचीजी.  :-))

यह अवश्य है कि इस तरह के किसी ’विस्फोट’ के चलते किसे को अपने कान बन्द करने की आवश्यकता पड़ती, बल्कि, पाठक से संवेदना के तंतु सचेत रखने का आग्रह हुआ करता है.

:-)))

 

Comment by kanta roy on February 17, 2016 at 1:24pm
आपकी बात से मै शत - प्रतिशत सहमत हूँ कि रचनाओं पर खुलकर चर्चा होनी ही चाहिए । विधा के जानकारों को प्रस्तुत रचना पर सार्थक चर्चाओं से , लेखन ,पाठन में गम्भीरता सदा बनी रहेगी । रचनाओं में गुणवत्ता कायम रहने की सम्भावना अधिक हो उठेंगी । सीखने - सीखाने की परम्परा और समृद्ध हो उठेंगी ,ऐसा मेरा मानना है ।
सादर ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 17, 2016 at 1:09pm
मैं उक्ति विस्फोट की संभावना से तो सहमत हूँ,कई उदाहरण देखे हैं ऐसे, पर क्या इस तरह के सुकोमल भाव विस्फोटक हो सकते हैं?
फिर उन्हें ग़ज़ल में कैसे कहा जाए ?

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 17, 2016 at 12:52pm
आदरणीय सौरभ जी,
अभी बहुत कुछ सीखना समझना बाकी है,
ग़ज़ल विधा में मैं बहुत नई अभ्यासी हूँ।
मैं विधाजन्य किसी भी चर्चा का स्वागत करती हूँ, ताकि हम सबकी समझ को सदिश अपेक्षित विस्तार मिले।
सादर
Comment by Sushil Sarna on February 17, 2016 at 12:49pm

मेरा आँगन गुँजाती है नन्ही परी ।
पंछी बन चहचहाती है नन्ही परी ।

उसकी मुस्कान से फूल सारे खिले
हँस के गुलशन सजाती है नन्ही परी ।

वाह बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण अशआर हैं आपकी इस दिलकश ग़ज़ल में। हार्दिक बधाई आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 17, 2016 at 12:43pm

मैं पहेली नहीं बुझवा रहा, आदरणीया कान्ताजी. हालाँकि, अभी कइयों को यही लग रहा होगा. लेकिन ग़ज़ल के पुराने और गंभीर रचनाकर्मी हैं इस मंच पर. मैं उनसे अपेक्षा कर रहा हूँ कि वे ज़रा आयें और मेरे कहे को समझायें. या, मैं ग़लत हूँ तो मेरी समझ का परिमार्जन करें. 

आदरणीया प्राची जी की ग़ज़ल से बढिया और कोई प्रस्तुति नहीं हो सकती जिस पर ग़ज़ल के भाव पक्ष को लेकर ऐसी खुली चर्चा हो सके. कारण ? वो यह है, कि --

१. आदरणीया प्राचीजी कोई नयी-नयी रचनाकार नहीं हैं. 

२. वे मंच की वरिष्ठ रचनाकर्मी हैं. अतः उनका दायित्वबोध अधिक गहराई लिये हुए है. 

३. वे आवश्यकता से अधिक संवेदनशील नहीं हैं. वे सोचने नहीं बैठ जायेंगी कि उनकी रचना पर पता नहीं क्या कुछ लिख दिया गया.

४. ग़ज़ल ऐसी विधा है जो बहुत कुछ की अपेक्षा करती है. वह ’बहुत कुछ’ क्या है, इस पर जानकार लोग अपनी बातें रखें. 

५. वे किसी विधा के मर्म तक पहुँच कर तदनुरूप अभ्यास करती हैं. अतः वे उपयुक्त शिष्य हैं.

६. इस तथ्य का साक्षी यह मंच ही है कि वे अत्यंत उत्साही लगनशील अभ्यासकर्मी हैं. अतः, उनके माध्यम से चर्चा होना समीचीन है.

७. रचना पर संवाद बनाने की प्रक्रिया पुनः व्यवहार में आयेगी. 

 

सर्वोपरि, मंच पर रचनाओं के माध्यम से रचनाकर्म तथा विधाओं पर संवाद होना एक तरह से रुक गया है.अकसर ’जानकार’ पाठक भी ’वाह-वाह’ कर पल्ला झाड़ते हुए निकलते दिखते हैं. और तो और,  मंच पर एक वर्ग ऐसा भी खड़ा हो गया है जो व्यक्ति पूजा में भले न यकीन करता हो, रचनाकार के नाम को देख कर अवश्य ’टिप्पणियाँ’ करता है. यह इस मंच की परिपाटी नहीं रही है. यह मंच ऐसा है, जहाँ, इसके प्रधान सम्पादक की रचनाओं में अशुद्धि होने पर लाल रंग लगता है, या सवाल उठते हैं, उठाये जाते हैं. फिर हम जैसों की बिसात ही क्या है. 

सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 17, 2016 at 12:28pm

"ग़ज़ल की पंक्तियों के माध्यम से उक्ति-विस्फोट का संभाव्य बना रहना" ये  कैसा  धमाका  करने वाल  भाव गजल  में होता  है  आदरणीय  चाँद तारे तोड़  लाने  वाला  जैसा ? इसे किसी  शायर की पंक्ति की व्याख्या कर समझाए तो  कृतज्ञ  रहेंगे  | सादर 

Comment by kanta roy on February 17, 2016 at 12:24pm
यानि कि प्रत्येक शेर में मुकम्मल सी कोई बात हो ? अशआर में भावों की एकरूपता कारण बनी है इसे गजल से गीतिका बनने में ?
आदरणीय सौरभ जी ,हम सब कुछ नवलेखन प्रयासरत है यहाँ ,इस विधा में ,इसलिए इस पर जरा खुलकर समझाईये हमें । प्रबुद्ध लोग तो आपके इशारे को समझ ही लेंगे ,लेकिन हम अज्ञानी लोग कुछ नहीं समझ पायेंगे । सादर ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 17, 2016 at 12:09pm

//ये ग़ज़ल क्यों नहीं हो सकती? //

ये ग़ज़ल हो क्यों नहीं सकती ? अवश्य हो सकती है. लेकिन जो मैंने पहले की टिप्पणी मेंमैंने कहा उसे आपने कितना समझा ? ’ग़ज़ल की पंक्तियों के माध्यम से उक्ति-विस्फोट का संभाव्य अवश्य बना रहता है’ - इस वाक्य से क्या ज़ाहिर होता है ? 

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