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ग़ज़ल (2×16): मनोज अहसास

पीछे मायूसी का साया आगे खतरा अनजाना है
हर लम्हा ये सोच रहा हूँ खुद को कैसे समझाना है

तेरी यादों का सूरज भी काम नहीं आता अब मेरे
मुझको इस मुश्किल मौसम में खुद से दूर चले जाना है

हम दिल की बातें लिखते हैं दिल न दुखाने की सीमा तक
ऊंची सोच की इस महफिल से हमको जल्द ही उठ जाना है

तेरे खतों की मधुर कहानी सोच से पीछे छूट गई है
पैथोलॉजी की रिपोर्ट का हाथों में एक अफसाना है

मां की हथेली चूम के निकला फौजी बेटा अपने घर से
उसको यह आभास हुआ है मुश्किल लौट के अब आना है

मुझमें लाख कमी है लेकिन इतना भी मायूस ना हो तू
मेरा अक्स तेरी आंखों से एक न एक दिन मिट जाना है

झूठी बातें, झूठे सपने, शाम समय, अंधियारी सोच
शायर को गजलें कह कह कर बस खुद को ही तड़पाना है

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 28, 2019 at 5:51am

आ. भाई मनोज जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Manoj kumar Ahsaas on August 25, 2019 at 12:38pm

हार्दिक आभार आदरणीय कबीर साहब

आपकी बात पर विचार कर रहा हूँ

सादर आभार

Comment by Samar kabeer on August 25, 2019 at 12:15pm

जनाब मनोज कुमार अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'तेरे खतों की मधुर कहानी सोच से पीछे छूट गई है 
पैथोलॉजी की रिपोर्ट का हाथों में एक अफसाना है'

इस शैर के ऊला में 'ख़त' शब्द का बहुवचन "ख़तूत" होता है,और सानी से मुझे इत्मीनान नहीं,विचार करें ।

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