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न बैठो इतने करीब मेरे कहीं मेरा दिल मचल न जाए

अब इतनी भी दूर तो न जाओ ये जान मेरी निकल न जाए ।।

 

जो बर्फ़ अरमानों पर जमी है तेरी तपिश से पिघल न जाए

पिघल गई गर तो मेरी आँखों की झील भर के उछल न जाए ।।

 

बड़ा ही शातिर ये वक़्त है फिर नई कोई चाल चल न जाए

मिलन से पहले घड़ी विरह की मिलन का लम्हा निगल न जाए ।।

 

तेरी छुअन से हुई वो जुम्बिश की दिल की धड़कन बिखर गई है

 न छूना मुझ को सनम दुबारा ये साँस जब तक सँभल न जाए ।।

 

मैं उस की खातिर हूँ सज के बैठा है शौक दिल में और एक डर भी

कि मेरे कातिल को फ़िर भी मुझ में कमी कहीं कोई खल न जाए ।।

 

       (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Samar kabeer on April 18, 2017 at 6:11pm
जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
लय के बारे में गुणीजन बता ही चुके हैं ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 18, 2017 at 4:17pm

आदरणीय गुरुप्रीत जी इस शानदार ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Ravi Shukla on April 18, 2017 at 2:29pm

आदरणीय गुरप्रीत जी बहुत बढि़या गजल कही है आपने  इसकी लय से अनुमान लग रहा ह बह्र का  बधाई स्‍वीकार करें ।  पोस्‍ट करने से पहले गजल के अरकान लिख दिया करें । सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 18, 2017 at 11:29am

वाह वाह.... बहुत खूब आदरणीय गुरप्रीत जी .....
थोडा लय को और साधिये......मज़ा आयेगा 
सादर 

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