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( बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे......(ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

221 2121 1221 212

बेजान था मैं फिर भी तो मारा गया मुझे
कल घाट मौत के यूँ उतारा गया मुझे (1)

मैं जा रहा था रूठ के लेकिन सदा न दी
था सामने खड़ा तो पुकारा गया मुझे (2)

मैं एक साँस में कभी बाहर न आ सकूँ
दरिया में और गहरे उतारा गया मुझे (3)

अक्सर यही हुआ है मैं जब भी दुरुस्त था
बिगड़ा नहीं था फिर भी सुधारा गया मुझे (4)

देता रहूँ सबूत मैं कब तक वज़ूद का
हर बार हर क़दम पे नक़ारा गया मुझे (5)

वो जानते हैं जिस्म मेरा भी है काग़ज़ी
पर आग से हमेशा गुज़ारा गया मुझे (6)

अहबाब ऐसे हैं तो कमी क्यों अदू की हो
करते हैं याद सबको बिसारा गया मुझे (7)

वो चाहते थे देखना मुझको डरा हुआ
जब डूबने लगा तो उभारा गया मुझे (8)

*मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Wednesday

जी, उला मिसरा में होती लग रही है..

Comment by सालिक गणवीर on Wednesday

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी

सादर अभिवादन

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और सराहना के लिए हृदय से आभार. आप सहीह कह रहे हैं हमेशा की बजाय "सदा ही" लिखना उचित होगा।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Wednesday

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन ।अच्छी गजल हुई है हार्दिक बधाई । मुझे छटे शेर में लय बाधित होती लग रही है । देखिएगा । सादर

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