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लिए सुख की चाहतें हम - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

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‌मेरे  साथ  चलने  वाले  तुझे  क्या  मिला  सफर में
‌बड़ा चैन था अमन था बड़ा सुख था तुझको घर में।१।
**
‌कहीं दुख भरी ज़मीं  तो  कहीं  गम का आसमाँ है
‌लिए सुख की चाहतें हम अभी लटके हैं अधर में।२।
**
‌जहाँ  देखता हूँ  दिखता  मुझे  सिर्फ  ये  धुआँ है
‌रह फर्क अब गया क्या  भला  गाँव और' नगर में।३।
**
‌नहीं सिर्फ  दोष उन का  बढ़ी  दूरियाँ  जो ऐसी
‌भरी कालिखें ही केवल यहाँ हमने भी जिगर में।४।
**
‌उन्हीं रास्तों से जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
‌चला जा रहा हूँ बेबस मैं अकेला अब सफर में।५।
**
मौलिक.अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2020 at 6:20am

आ. भाई समर जी, सादर आभार..

Comment by Samar kabeer on January 30, 2020 at 12:20pm

अब मिसरे ठीक हैं ।

//एक बात और क्या किसी अन्य शायर के मिसरे या मिलते जुलते भाव को गजल में लेना उचित नहीं है । इस पर भी मार्गदर्शन चाहता हूँ//

किसी शाइर से मिसरा टकराने को "तवारुद'' कहते हैं,मालूम होने पर बाद में कहने वाले शाइर को अख़लाक़न अपना मिसरा हटाना या बदलना चाहिए ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 30, 2020 at 4:25am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और मार्गदर्शन के लिए आभार। इंगित कमियों में सुधार का प्रयास किया है देखियेगा ।
//बड़ा अम्न चैन तुझको बड़ा सुख मिला था घर में
‌/'रहा फर्क अब भला क्या यहाँ गाँव औ' नगर में'
//कभी तुम थे हमकदम तो रही पथ में रौनकें भी
लिए साथ अब उदासी चला जा रहा सफर में।।

एक बात और क्या किसी अन्य शायर के मिसरे या मिलते जुलते भाव को गजल में लेना उचित नहीं है । इस पर भी मार्गदर्शन चाहता हूँ। सादर...

Comment by Samar kabeer on January 29, 2020 at 3:18pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें ।

‌'बड़ा चैन था अमन था बड़ा सुख था तुझको घर में'

इस मिसरे में सहीह शब्द "अम्न" है,देखियेगा ।

‌'रह फर्क अब गया क्या  भला  गाँव और' नगर में'

ये मिसरा बह्र में नहीं है,देखियेगा ।

‌'उन्हीं रास्तों से जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे'

ये मिसरा बशीर बद्र साहिब की ग़ज़ल का है,उनका शैर है:-

'उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे

मुझे रोक रोक पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है'

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 23, 2020 at 5:49am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by TEJ VEER SINGH on January 22, 2020 at 8:08pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बहुत शानदार गज़ल।

उन्हीं रास्तों से जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
‌चला जा रहा हूँ बेबस मैं अकेला अब सफर में।५।

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