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ग़ज़ल : इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा

अरकान : 221 2121 1221 212

इक दिन मैं अपने आप से इतना ख़फ़ा रहा

ख़ुद को लगा के आग धुआँ देखता रहा

दुनिया बनाने वाले को दीजे सज़ा-ए-मौत

दंगे में मरने वाला यही बोलता रहा

मेरी ही तरह यार भी मेरा अजीब है

पहले तो मुझको खो दिया फिर ढूँढता रहा

रोता रहा मैं हिज्र में और हँस रहे थे तुम

दावा ये मुझसे मत करो, मैं चाहता रहा

कुछ भी नहीं कहा था अदालत के सामने

वो और बात है कि मैं सब जानता रहा

ईनाम क़ौमी एकता का मिल गया उसे

जो आदमी को आदमी में बाँटता रहा

तू अपने हक़ में क्यूँ कभी भी सोचता नहीं

कल रात देर तक मैं यही सोचता रहा

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by आशीष यादव on December 15, 2019 at 6:21pm

बेहतरीन अशआर। सुंदर गजल।

Comment by Samar kabeer on December 13, 2019 at 2:40pm

जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'तू अपने हक़ में क्यूँ कभी भी सोचता नहीं'

इस मिसरे में 'कभी' के साथ 'भी' का प्रयोग उचित नहीं होता,इसे बदलने का प्रयास करें ।

Comment by Mahendra Kumar on December 10, 2019 at 7:06pm

आपकी पारखी नज़र को सलाम आदरणीय निलेश सर। इस मिसरे को ले कर मैं दुविधा में था। पहले 'दी' के साथ कहा फिर 'के' के साथ और आख़िर में पुनः 'दी' कर दिया पर पूर्ण विश्वास नहीं था कि कौन बेहतर है। आपने संशय दूर कर दिया। मिसरा संशोधित कर दिया है। ग़ज़ल आपको पसन्द आयी, लिखना सार्थक रहा। बहुत-बहुत शुक्रिया। हार्दिक आभार। सादर।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 10, 2019 at 1:03pm

बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है आ. महेंद्र जी। .
ख़ुद को लगा दी ..ख़ुद को लगा के 
.

बस ऐसी ही छोटी मोटी गुँजाइश है। .
बहुत बहुत बधाई 

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