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तुम्हारा घोंसला

जैसे तुमने

तिनका तिनका जोड़ कर

धीरे-धीरे, बनाया अपना घोंसला

वैसे ही

तुमको देख-देख कर

बढ़ता रहा, मेरा भी हौसला

तुम एक- एक दाना चुग कर लायीं

अपने बच्चों को भोजन कराया

मैंने भी, वेसे ही खेतों में फसल लगायीं

दिन रात श्रम कर अन्न उगाया

धीरे धीरे रेत,बजरी ,सीमेंट ले आया

एक- एक ईंट जोड़कर

अपने सपनों का महल बनाया

जिस तरह तुमने अपने बच्चों को

उनके पैरों पर खड़ा किया

उड़ना सिखाया , उड़ा दिया, विदा किया  

मैंने भी अपनी बिटिया को

पढ़ा –लिखा कर बड़ा किया

तुम्हारी प्रेरणा दे ,उसको ससुराल, विदा किया

अब अपने घर में, मैंने रख लिया है

वो खाली पड़ा तुम्हारा घोंसला

जिसे देख-देख कर

रोज बढाता रहता हूँ

अपने जीवन जीने का हौसला !!

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on December 16, 2014 at 8:27pm

 सोमेश भाई आपका हार्दिक धन्यवाद  !

Comment by Hari Prakash Dubey on December 16, 2014 at 8:22pm

आदरणीय  श्री गणेश जी "बागी जी,

सादर अभिवादन !

" कविता : तुम्हारा घोंसला" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" के रूप मे सम्मानित किये जाने पर आपका एवं संपूर्ण सम्पादक मण्डल का  हार्दिक आभार, इधर संस्था के कार्यों से 5 दिसम्बर से एक ट्रेनिंग प्रोग्राम एवं सम्मलेन में बाहर जाना पडा एवं आज ही घर वापसी हुई है ,अत्यधिक व्यस्त कार्यक्रम होने के  कारण इस मंच पर सक्रिय भी नहीं रह पाया ,पर आज यह सम्मान पाकर हार्दिक प्रसन्नता हो रही है इस स्वीकारोक्ति के साथ ,की मैं साहित्यिक  रूप से सम्रध नहीं हूँ ,पर आप सभी ने बावजूद इसके रचना को इस योग्य समझा ये प्रेरणादायक है ,आपका पुनः धन्यवाद |

सादर

हरि प्रकाश दुबे  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 16, 2014 at 2:28pm

संवेदना और प्रेरणा के स्तर पर सार्थक समानान्तर दृश्य प्रस्तुत हुए हैं. आपकी प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई तथा अनेकानेक शुभकामनाएँ, आदरणीय हरी प्रकाश जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 16, 2014 at 10:26am

एक बार फिर से इस मर्मस्पर्शी सकारात्मक सोच को जन्मती रचना हेतु हार्दिक बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 16, 2014 at 12:54am

सुंदर भावपूर्ण बेहतरीन रचना ... बेहतरीन रचना को बेहतरीन  सम्मान आपको बहुत बहुत बधाई आदरणीय  हरि प्रकाश दुबे जी 

Comment by somesh kumar on December 15, 2014 at 11:59pm

बधाई भाई जी !सुंदर और भावपूर्ण रचना को उचित स्थान मिला है 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 1, 2014 at 11:29pm

आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया पर आपका हार्दिक आभार सोमेश भाई ! पुनः धन्यवाद !

Comment by somesh kumar on December 1, 2014 at 11:00pm

घर हो या घोसला ,हौसला चाहिए उसे खड़ा रखने और बनाने के लिए ,सुंदर रचना पर बधाई 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 1, 2014 at 8:46pm

आदरणीय डॉक्टर गोपाल नारायन साहब ,आपका हार्दिक आभार!सादर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 1, 2014 at 10:08am

क्या बात है i अति सुन्दर i

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