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दोहा पंचक . . . वक्त

दोहा पंचक. . . . वक्त

हर करवट में वक्त की,छिपी हुई है सीख ।
आ जाए जो वक्त तो, राजा मांगे भीख ।।

डर के रहना वक्त से, ये शूलों का ताज ।
इसकी लाठी तो सदा, होती बे-आवाज ।।

पल भर की देता नहीं, वक्त किसी को भीख ।
अन्तिम पल की वक्त में , गुम हो जाती चीख ।।

बिना वक्त मिलता नहीं, किस्मत का भी साथ ।
कभी पहुँच कर लक्ष्य पर , लौटें खाली हाथ ।।

सुख - दुख सब संसार में, रहें वक्त  आधीन  ।
काल पाश में  आदमी, लगता कितना दीन ।।

सुशील सरना/29-7-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on August 3, 2024 at 8:35pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी ।सहमत 

Comment by Sushil Sarna on August 3, 2024 at 8:35pm

आदरणीय समर कबीर जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय ।सहमत 

Comment by Sushil Sarna on August 3, 2024 at 8:34pm

आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । अन्तिम दोहे में  आपकी बात से सहमत । देखता हूँ सर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 3, 2024 at 11:06am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।

कुछ दोहों पर गुणींजनों की टिप्पणीं का संज्ञान लें।

Comment by Samar kabeer on August 1, 2024 at 6:04pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी दोहावली हुई बधाई स्वीकार करें ।

अंतिम दोहे पर जनाब अशोक रक्ताले जी से सहमत हूँ ।

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 1, 2024 at 5:26pm

  आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, समय के आधार पर सुन्दर दोहावली रची है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सच है समय अच्छा आये तो खुशियाँ ला दे और कभी बुरा आये तो खुशियाँ छीन ही ले. समय के आगे राजा हो क्या रंक किसी की नहीं चलती है. अंतिम दोहे में दोनों पदों में तालमेल बहुत अच्छा नहीं है. ज़िन्दगी यदि तारों का खेल है तो अलग करने और मिलाने का काम भी तारे ही करेंगे 'वक्त' नहीं. सादर 

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