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दोहा अष्टम. . . . प्रश्न

दोहा अष्टम ......प्रश्न

उत्तर   सारे   मौन   हैं,  प्रश्न   सभी   वाचाल ।
किसने जानी आज तक,भला काल की चाल ।।

यह   जीवन   तो   शून्य  का, आभासी है रूप ।
पग - पग पर संघर्ष की, फैली तीखी धूप ।।

तोड़ सको तो तोड़ दो, प्रश्नों का हर जाल ।
यह जीवन तो पूछता, हरदम नया सवाल ।।

हर मोड़ पर जिंदगी, पूछे एक सवाल ।
क्या पाने की होड़ में, जीवन दिया निकाल ।।

फिसला जाता रेत सा, जीवन जरा संभाल ।
क्या जानें किस मोड़ पर, मिले अचानक काल ।।

बहुतेरे हैं प्रश्न पर, उत्तर भी कुछ मौन ।
क्या है आखिर जीव में, सूक्ष्म बताए कौन ।।

निश्चित जो संसार में,  उस पर कैसा भेद ।
आदि- अन्त के प्रश्न पर, क्यों करना निर्वेद ।।

वक्त के  आगे जीव की, कभी न गलती  दाल ।
सुलझ न पाया आज तक, वक्त का उलझा जाल ।।

सुशील सरना / 25-7-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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