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मोहन दास जब यमराज के सामने पहुंचे,"मोहन जी, जब आपको गोलियाँ लग गयीं और आप लगभग मरणासन्न हो गये तो उस वक्त राम को पुकारने का क्या तात्पर्य था?”

"महोदय, आप मेरे "हे राम" उच्चारण का अर्थ शायद समझ नहीं सके।”

"क्या इसमें भी कोई गूढ़ रहस्य है? मेरे विचार से तो यह एक मरते हुए व्यक्ति द्वारा अपने इष्ट देव से अपनी रक्षा हेतु मात्र एक याचना है।”

"नहीं मान्यवर, ऐसा नहीं है। मृत्यु तो सभी की कभी ना कभी अवश्य ही होनी  है । मुझे उसका कोई भय नहीं था।”

"तो फिर वह आर्तनाद  ?”

“वह आर्तनाद नहीं था। वह मेरी जीवन शैली का प्रतीक था। राम तो मेरे आदर्श हैं। राम मेरा जीवन ,मेरी प्रेरणा , मेरी आस्था हैं।  उन्होंने मुझे जीवन में जो कुछ दिया उसके प्रति आभार प्रकट करने के लिये यह राम के प्रति मेरा अंतिम विदाई संदेश था।" 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on October 20, 2021 at 1:08pm

हार्दिक आभार आदरणीय रक्षिता जी।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 20, 2021 at 1:07pm

हार्दिक आभार आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 19, 2021 at 9:07pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी, कम से कम शब्दों मे मनोहर लगी आपकी लघुकथा और 'हे राम' शब्द के समुचित अर्थ भी! हार्दिक बधाई 

Comment by रक्षिता सिंह on October 16, 2021 at 3:49pm

आदरणीय वीर जी, सादर प्रणाम 

बहुत सुंदर लघुकथा हार्दिक बधाई स्वीकार करें। 

Comment by TEJ VEER SINGH on October 12, 2021 at 6:37pm

हार्दिक आभार आदरणीय मुसाफ़िर जी।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 12, 2021 at 6:25pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 11, 2021 at 7:53pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। अच्छी लघुकथा हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on October 11, 2021 at 6:51am

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब, अच्छी लघुकथा लिखी है आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें I 

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