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अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

1222  1222  122

ज़माने भर में जितने हादसे हैं.
हमें ख़ामोश होकर देखने हैं.

किसी को चलने में दिक़्क़त न आए,
चलो इतना सिमट कर बैठते हैं.

मेरी बेबाकियों के रास्ते में,
मेरी कुछ ख़्वाहिशों के कटघरे हैं.

बिना जिसके हुआ था जीना मुश्किल,
उसी के होने से शिकवे गिले हैं.

तुम्हारी याद भी इक रोग है क्या,
तुम्हारे ख़त को छूते डर रहे हैं.

दलीले रह गई कमज़ोर मेरी,
वो अपनी बात कह कर जा चुके हैं.

तरक़्क़ी वाली ये दुनिया है ऐसी,
यहाँ अब हर किसी से फासले हैं.

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on July 5, 2020 at 4:32pm

आदरणीय अमीर साहब गजल पर ध्यान देने के लिए बहुत-बहुत आभार आपका सुझाव उत्तम है तुरंत पालन किया जा रहा है

सादर

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 5, 2020 at 1:47pm

जनाब मनोज कुमार 'अहसास' जी आदाब।शानदार ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।

//दलीले रह गई कमज़ोर मेरी,// समर सर बता ही चुके हैं, दलीलें बहुवचन है इसलिए गई को भी गईं कर लें। सादर। 

Comment by मनोज अहसास on July 4, 2020 at 3:51pm

आदरणीय समर कबीर साहब

बहुत बहुत आभार सर आपकी सलाह के बिना मेरी हर ग़ज़ल अधूरी है आप कुशल से तो है ना थोड़ा रेस्ट कर लीजिए सर मैं आपसे पहले भी कहता रहा हूं आराम भी जरूरी है हार्दिक आभार सर

Comment by मनोज अहसास on July 4, 2020 at 3:48pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी हार्दिक आभार

जो टंकण त्रुटियां आपको दिखाई दें उन्हें बता भी दिया करें बड़ी कृपा होगी

सादर

Comment by Samar kabeer on July 4, 2020 at 3:19pm

जनाब मनोज कुमार अहसास जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

ये देख कर प्रसन्नता हुई कि इस बार आपने नुक़्ते लगाए हैं ।

'दलीले रह गई कमज़ोर मेरी'

इस मिसरे में 'दलीले' को "दलीलें" कर लें ।

यहाँ अब हर किसी से फासले हैं'

पारिवारिक कारणों से कुछ समय ओबीओ पर हाज़िर नहीं हो सकूँगा,सिर्फ़ तरही मुशाइर: में शिर्कत हो सकेगी, आपको कहीं मेरी ज़रूरत महसूस हो तो फ़ोन पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 4, 2020 at 10:09am

आ. भाई मनोज जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई । कुछ टंकण त्रुटियाँ हैं देखियेगा ।

कृपया ध्यान दे...

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