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क्यों ना जड़ पर चोट ?

पैसों से क्या जान को

हम पाएगें तोल ?

सदा - सदा को बुझ गए

जब चिराग़ अनमोल

किन-किन के थे वरद हस्त

जो पनपी यह खोट

खोज-खोज उनकी करें

क्यों ना जड़ पर चोट ?

इस बढ़ती विष बेल पर

यदि ना डली नकेल

चक्रब्याज की वृद्धि सम

बढ़ जाएगा खेल

घर के ही दुश्मन करें

जन्म भूमि से घात

पर दुख से मतलब नहीं

अपना सुख दिन - रात

पा कर शह उन्मुक्त हो

नित बढ़ते दुर्दान्त

रक्षक बल  को ख़ौफ़ बिन

मार रहे पथ भ्रान्त

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Usha Awasthi on July 11, 2020 at 7:19pm

 सादर प्रणाम, सुरेंद्र नाथ सिंह जी,

उत्साह बढ़ाती टिप्पणी हेतु बहुत धन्यवाद

Comment by नाथ सोनांचली on July 11, 2020 at 12:32pm

आद उषा अवस्थी जी सादर अभिवादन। बढ़िया रचना हुई है। बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by Usha Awasthi on July 6, 2020 at 10:45pm

सादर प्रणाम ,  भाई लक्ष्मण धामी जी, रचना पर आपके विचार जानकर खुशी हुई।हार्दिक धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2020 at 6:01am

आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन । अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Usha Awasthi on July 5, 2020 at 3:28pm

आदाब , आ0, हार्दिक आभार आपका

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 5, 2020 at 1:52pm

आदरणीया ऊषा अवस्थी जी आदाब, सुन्दर रचना हुई है बधाई स्वीकार करें। सादर। 

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